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विज्ञान जितना प्रगति करता है
उतना हिन्दू धर्म के क़रीब आता है - डॉ. रतन शारदा
बचपन से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहने वाले, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की बात करने वाले, पूर्वोत्तर, जम्मू-कश्मीर और पंजाब पर केन्द्रित विषय पर डॉक्टरेट ऑफ फिलॉसफी की उपाधि प्राप्त करने वाले डॉक्टर रतन शारदा इस अंक के प्रवासी अतिथि हैं. आर.एस.एस. 360, मेमोयर्स ऑफ ए ग्लोबल हिंदू,संघ और स्वराज , प्रोफेसर राजेंद्र सिंह की जीवन यात्रा, संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी पर लिखी श्री रंगा हरि की कृति का अनुवाद जैसी लोकप्रिय पुस्तक के लेखक से प्रवासी चेतना ने सामयिक मुद्दों पर बात की.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक क्रान्तिकारी संगठन है, देश में दूसरा कोई संगठन इसके आस-पास कंही नहीं आता. इसमें अकेले समाज को बदलने, जातिवाद को ख़त्म करने और गरीबों के आसूं पोछने की क्षमता है. मुझे इस क्रांतिकारी संगठन से बहुत हैं जिसने एक नया भारत बनाने की जिम्मेदारी ली है। आर.एस.एस. 360 के प्रस्तावना में जयप्रकाश नारायण का लिखित उपरोक्त कथन उस समय के और आज के समय के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत प्रासंगिक और सार्थक है।
प्रवासी चेतना : वर्तमान राजनीतिक वातावरण में हिन्दू और हिन्दुत्व को नए तरीके से परिभाषित किया जा रहा है इस सन्दर्भ में आपकी टिप्पणी
रतन शारदा : भारत एक प्राचीन हिन्दू राष्ट्र है. हिन्दू संस्कृति के बारे में कांग्रेस के नेताओं द्वारा जो कुछ कहा जा रहा है वह उसका सैद्धांतिक विरोध है। आज के पहले यही धारणा थी की जो हिन्दू संस्कृति और संस्कारों का उपहास उड़ाएगा, उनका तिरस्कार करेगा वह प्रबुद्ध जन में गिना जायेगा. लेकिन अब ऐसा नहीं है। हमारा राष्ट्रत्व हिन्दू है. इन लोगों ने दशकों देश पर राज्य किया। शासित होना उनसे सहन नहीं हो रहा है. इसीलिए अनाप शनाप बोले जा रहे हैं। सनातन धर्म का अस्तित्व तो आदि काल से है, हमारी कल्पना अन्य धर्मों की अपेक्षा यथार्थ के अधिक निकट है। विज्ञान जितना तरक्की करता है उतना ही हिन्दू धर्म के नजदीक आता है।
प्रवासी चेतना : राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद ?
रतन शारदा : हमारे यंहा और पश्चिम में राष्ट्रवाद की परिभाषा भिन्न है उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ विस्तार करना होता है, जबकि हमारे यहाँ राष्ट्रवाद का अर्थ राष्ट्रत्व से होता है। हमारा राष्ट्रत्व हिन्दू है। जीवन जीने के तरीके से है। जिसके मूल में सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः समाया है.
प्रवासी चेतना : नौनिहालों को अपनी संस्कृति से किस तरह जोडें ?
रतन शारदा : इसकी शुरुआत विद्यालय से होनी चाहिए उसके बाद घर से। अब तक इतिहास को तथ्यों से दूर तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है। आज इतिहास को फिर से लिखने की जरूरत है। आज के ज्यादातर माता पिता को सही चीजें ही नहीं पता है तो फिर वह अपने बच्चों को क्या सही बता पाएँगे? इसलिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना बहुत जरूरी है। आज तो लोग शादी ही नहीं करना चाहते। यदि शादी कर भी लिए तो बच्चे ही नहीं पैदा करना चाहते. ऐसे में समाज किस दिशा में जायेगा ? एकाकी जीवन में उन्हें क्या सामाजिक बोध होगा ?
प्रवासी चेतना : ऐसे में सामाजिक संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए?
रतन शारदा : ऐसे में सामाजिक संगठनों का दायित्व तो रहता ही है। उन्हें अपने कार्यक्रमों के माध्यम से जिसमे संस्कार शामिल हो बच्चों को, लोगों को ऑडियो विजुअल तरीके से बताना चाहिए। काफी लोग प्रयास कर रहे हैं। इसे और वृहत स्तर पर ले जाने की जरूरत है। आज के नवयुवक और बच्चे तार्किक हैं। उन्हें ऐसे ही कुछ भी नहीं बताया जा सकता है। हमें उनके लिए उनके तरीके से उनकी भाषा में बात करनी होगी। तब जाकर हम उनसे जुड़ पाएंगे।
प्रवासी चेतना : आज साहित्य का स्तर ? क्यों रामधारी सिंह दिनकर, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जैसे नहीं हैं ?
रतन शारदा : नहीं ऐसी बात नहीं है। बहुत अच्छे अच्छे साहित्य आज भी लिखे और पढ़े जा रहे हैं। जैसे एक लेखक साकेत सुर्येश हैं उन्होंने एक पुस्तक भेजी थी एक स्वर सहस्त्र प्रतिध्वनियाँ अच्छी पुस्तक है। एक और नाम मनोज मुन्तशिर का भी है। आज जरूरत है ऐसे साहित्य की जिसमे यथार्थ के साथ जिज्ञासा को शांत करने वाले तथ्य हो।
प्रवासी चेतना : भारतीय संस्कृति के प्रणेता हम सभी के आराध्य राम जी का भव्य मंदिर अयोध्या में बन रहा है।आखिर लम्बी लड़ाई के बाद हम जीत ही गए ?
रतन शारदा : यदि भारतीय जन मानस के नामों को गौर से देखें तो हमें हर सातवे आठवे नाम में भगवान राम का नाम मिल जायेगा। उनके जन्मस्थान पर एक आक्रांता द्वारा मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया। हमारी मांग कोई बहुत बड़ी मांग नहीं थी, सिर्फ हमारे आराध्य भगवन राम के जन्मस्थान पर उनका भव्य मंदिर बने।न्यायलय के आदेशानुसार आज मंदिर का निर्माण हो रहा है।हम सब के लिए गर्व की बात है। लेकिन हर बात पर कानून की दुहाई देने वाले उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी उनका जिहादी रुदन जारी है।
प्रवासी चेतना : अब यह रुदन समाप्त होना चाहिए?
रतन शारदा : राम मंदिर के विरोधियों ने स्पष्ट कहा था कि यदि न्यायालय मान ले कि मंदिर था, तो हम जगह छोड़ देंगे। न्यायालय का सम्मान करेंगे. परंतु हम देख रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद जिहादी रुदन जारी है। अब आज के निर्णय के बाद भी मुसलमान समाज को भड़काने का काम शुरू हो ही चुका है। क्योंकि समाज में द्वेष समाप्त हो, यह तो वामपंथियों और जिहादियों के लिए अनर्थ है। ये ऐसे जहरीले पौधे हैं जो पनपने के लिए विपरीत परिस्थतियां ही चाहते हैं। परंतु मुझे लगता है कि जनता समझदार है, वह इस रुदन को पीछे छोड़ना चाहती है।
इन सेक्युलर अनुदार उदारवादी तबके के घटते प्रभाव से उनके समर्थकों को यह समझ लेना चाहिए कि देश अब इस अंध विरोध से आगे बढ़ना चाहता है। देश गर्व के साथ नए भारत के निर्माण के लिए अग्रसर है।
प्रवासी चेतना : हमारे पाठकों को सन्देश ।
रतन शारदा : आज पूरे विश्व को Hinduness (हिंदुपने) की आवश्यकता है। हिन्दू समाज ऐसा है जो प्रकृति की पूजा करता है क्योंकि वह जानता है कि प्रकृति है तो उसका जीवन है। प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन आज विश्व की आवश्यकता है। हिन्दू सभ्यता विस्तारवादी नहीं है। विस्तार के लिए विध्वंस नहीं करती।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक क्रान्तिकारी संगठन है, देश में दूसरा कोई संगठन इसके आस-पास कंही नहीं आता. इसमें अकेले समाज को बदलने, जातिवाद को ख़त्म करने और गरीबों के आसूं पोछने की क्षमता है. मुझे इस क्रांतिकारी संगठन से बहुत हैं जिसने एक नया भारत बनाने की जिम्मेदारी ली है। आर.एस.एस. 360 के प्रस्तावना में जयप्रकाश नारायण का लिखित उपरोक्त कथन उस समय के और आज के समय के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत प्रासंगिक और सार्थक है।
प्रवासी चेतना : वर्तमान राजनीतिक वातावरण में हिन्दू और हिन्दुत्व को नए तरीके से परिभाषित किया जा रहा है इस सन्दर्भ में आपकी टिप्पणी
रतन शारदा : भारत एक प्राचीन हिन्दू राष्ट्र है. हिन्दू संस्कृति के बारे में कांग्रेस के नेताओं द्वारा जो कुछ कहा जा रहा है वह उसका सैद्धांतिक विरोध है। आज के पहले यही धारणा थी की जो हिन्दू संस्कृति और संस्कारों का उपहास उड़ाएगा, उनका तिरस्कार करेगा वह प्रबुद्ध जन में गिना जायेगा. लेकिन अब ऐसा नहीं है। हमारा राष्ट्रत्व हिन्दू है. इन लोगों ने दशकों देश पर राज्य किया। शासित होना उनसे सहन नहीं हो रहा है. इसीलिए अनाप शनाप बोले जा रहे हैं। सनातन धर्म का अस्तित्व तो आदि काल से है, हमारी कल्पना अन्य धर्मों की अपेक्षा यथार्थ के अधिक निकट है। विज्ञान जितना तरक्की करता है उतना ही हिन्दू धर्म के नजदीक आता है।
प्रवासी चेतना : राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद ?
रतन शारदा : हमारे यंहा और पश्चिम में राष्ट्रवाद की परिभाषा भिन्न है उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ विस्तार करना होता है, जबकि हमारे यहाँ राष्ट्रवाद का अर्थ राष्ट्रत्व से होता है। हमारा राष्ट्रत्व हिन्दू है। जीवन जीने के तरीके से है। जिसके मूल में सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः समाया है.
प्रवासी चेतना : नौनिहालों को अपनी संस्कृति से किस तरह जोडें ?
रतन शारदा : इसकी शुरुआत विद्यालय से होनी चाहिए उसके बाद घर से। अब तक इतिहास को तथ्यों से दूर तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है। आज इतिहास को फिर से लिखने की जरूरत है। आज के ज्यादातर माता पिता को सही चीजें ही नहीं पता है तो फिर वह अपने बच्चों को क्या सही बता पाएँगे? इसलिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना बहुत जरूरी है। आज तो लोग शादी ही नहीं करना चाहते। यदि शादी कर भी लिए तो बच्चे ही नहीं पैदा करना चाहते. ऐसे में समाज किस दिशा में जायेगा ? एकाकी जीवन में उन्हें क्या सामाजिक बोध होगा ?
प्रवासी चेतना : ऐसे में सामाजिक संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए?
रतन शारदा : ऐसे में सामाजिक संगठनों का दायित्व तो रहता ही है। उन्हें अपने कार्यक्रमों के माध्यम से जिसमे संस्कार शामिल हो बच्चों को, लोगों को ऑडियो विजुअल तरीके से बताना चाहिए। काफी लोग प्रयास कर रहे हैं। इसे और वृहत स्तर पर ले जाने की जरूरत है। आज के नवयुवक और बच्चे तार्किक हैं। उन्हें ऐसे ही कुछ भी नहीं बताया जा सकता है। हमें उनके लिए उनके तरीके से उनकी भाषा में बात करनी होगी। तब जाकर हम उनसे जुड़ पाएंगे।
प्रवासी चेतना : आज साहित्य का स्तर ? क्यों रामधारी सिंह दिनकर, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जैसे नहीं हैं ?
रतन शारदा : नहीं ऐसी बात नहीं है। बहुत अच्छे अच्छे साहित्य आज भी लिखे और पढ़े जा रहे हैं। जैसे एक लेखक साकेत सुर्येश हैं उन्होंने एक पुस्तक भेजी थी एक स्वर सहस्त्र प्रतिध्वनियाँ अच्छी पुस्तक है। एक और नाम मनोज मुन्तशिर का भी है। आज जरूरत है ऐसे साहित्य की जिसमे यथार्थ के साथ जिज्ञासा को शांत करने वाले तथ्य हो।
प्रवासी चेतना : भारतीय संस्कृति के प्रणेता हम सभी के आराध्य राम जी का भव्य मंदिर अयोध्या में बन रहा है।आखिर लम्बी लड़ाई के बाद हम जीत ही गए ?
रतन शारदा : यदि भारतीय जन मानस के नामों को गौर से देखें तो हमें हर सातवे आठवे नाम में भगवान राम का नाम मिल जायेगा। उनके जन्मस्थान पर एक आक्रांता द्वारा मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया। हमारी मांग कोई बहुत बड़ी मांग नहीं थी, सिर्फ हमारे आराध्य भगवन राम के जन्मस्थान पर उनका भव्य मंदिर बने।न्यायलय के आदेशानुसार आज मंदिर का निर्माण हो रहा है।हम सब के लिए गर्व की बात है। लेकिन हर बात पर कानून की दुहाई देने वाले उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी उनका जिहादी रुदन जारी है।
प्रवासी चेतना : अब यह रुदन समाप्त होना चाहिए?
रतन शारदा : राम मंदिर के विरोधियों ने स्पष्ट कहा था कि यदि न्यायालय मान ले कि मंदिर था, तो हम जगह छोड़ देंगे। न्यायालय का सम्मान करेंगे. परंतु हम देख रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद जिहादी रुदन जारी है। अब आज के निर्णय के बाद भी मुसलमान समाज को भड़काने का काम शुरू हो ही चुका है। क्योंकि समाज में द्वेष समाप्त हो, यह तो वामपंथियों और जिहादियों के लिए अनर्थ है। ये ऐसे जहरीले पौधे हैं जो पनपने के लिए विपरीत परिस्थतियां ही चाहते हैं। परंतु मुझे लगता है कि जनता समझदार है, वह इस रुदन को पीछे छोड़ना चाहती है।
इन सेक्युलर अनुदार उदारवादी तबके के घटते प्रभाव से उनके समर्थकों को यह समझ लेना चाहिए कि देश अब इस अंध विरोध से आगे बढ़ना चाहता है। देश गर्व के साथ नए भारत के निर्माण के लिए अग्रसर है।
प्रवासी चेतना : हमारे पाठकों को सन्देश ।
रतन शारदा : आज पूरे विश्व को Hinduness (हिंदुपने) की आवश्यकता है। हिन्दू समाज ऐसा है जो प्रकृति की पूजा करता है क्योंकि वह जानता है कि प्रकृति है तो उसका जीवन है। प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन आज विश्व की आवश्यकता है। हिन्दू सभ्यता विस्तारवादी नहीं है। विस्तार के लिए विध्वंस नहीं करती।

कैनवास पर जीवन रंग बिखेरते विजय वर्मा
राजस्थान के छोटे से गाँव गुढागौड़ जी निवासी कलाकार विजय वर्मा कैनवास पर अपनी कला को इतना बखूबी उतारते हैं की देखने वाला इनकी तारीफ़ किये बिना नहीं रहता. अपनी कला के जरिये देश विदेश में अपनी पहचान बना चुके हैं.
वर्तमान में मायानगरी मुंबई में सपरिवार निवास करते हैं.
मुख्य बस स्टैंड स्थित अपने घर से कसबे की पहाड़ी के विहंगम दृश्य को देखकर चित्र बनाने की उन्हें बड़ी जिज्ञासा थी. उन्होंने इसे बनाया,प्रसिद्धी मिली,नाम कमाया और फिर पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा. इन्होने इस क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किये. मुंबई की प्रसिध्द जहाँगीर आर्ट गैलरी,सिमरोझा आर्ट गैलरी,ओबेरॉय ललित कला अकादमी राजस्थान कला स्पंदन आर्ट फरे आदि स्थानों पर अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं. इनकी पेंटिंग विदेशी सैलानिओं को खुब पसंद आती है.
विजय वर्मा परंपरागत चित्रों की वास्तविक व् आधुनिक रूप में गहरी समझ व् दक्षता रखते हैं, हमेशा कुछ नया प्रयोग करते रहते हैं. इन्होने नरेन्द्र मोदी, जोर्ज बुश,महारानी विक्टोरिया, महात्मा बुद्ध, अमिताभ बच्चन ,राजस्थानी संस्कृति पर आधारित गणगौर,पणिहारी,पशु पक्षी आदि की पेंटिंग बनाई है.
कई बड़े सितारे कैनवास पर अपनी चित्र विजय वर्मा से बनवाते है. इनकी बनायीं सबसे श्रेष्ठ भगवन महावीर की पोट्रेट की प्रदर्शनी न्यू यॉर्क में लग चुकी है. साहित्य और ऐतिहासिक पुस्तके पढने में रूचि रखते हैं. प्रवासी चेतना की प्रतिनिधि अल्पिता यादव ने उनसे बात की.
प्रवासी चेतना :
क्या आपने कभी कलाकार बनाने के लिए सोचा था,या ऐसे ही बन
गए ?
विजय वर्मा :
नहीं, मैंने कभी भी कलाकार बनने के बारे में नहीं सोचा था. मुझे बचपन से ही चित्रकारी करने में अच्छा लगता था. शायद यही कारण है की मै पेंटिंग की तरफ आकर्षित हुआ. म्यूरल आर्ट भी मुझे काफी प्रभावित किआ.
प्रवासी चेतना :
आप ने सफलता किस तरह प्राप्त की. या फिर कहे की सफल होने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?
विजय वर्मा :
सबसे पहले तो सफल होने के लिए व्यक्ति के अन्दर आत्मविश्वास की जरूरत होती है. जब आप कोई चीज बार बार करते है तो ही उसमे नया करने की प्रेरणा मिलती है. कभी-कभी क्या होता है कि हम हार मान लेते हैं, पर उस हार को हार न मानकर आगे ईमानदारी और मेहनत से कर्म करना चाहिए. तभी सफलता आपके कदम चूमती है.
प्रवासी चेतना :
यदि आप कलाकार नहीं होते तो क्या होते ?
विजय वर्मा :
यह तो कहना बड़ा कठिन है की यदि कलाकार न होता तो क्या होता ? जैसा की मैंने पहले ही कहा की पेंटिंग ने मुझे हमेशा से प्रभावित किआ है. यदि मै कलाकार नहीं होता तो शायद लेखक या फोटोग्राफर होता. क्योंकि मुझे हिंदी साहित्य में बड़ी दिलचस्पी है.
प्रवासी चेतना :
एक कलाकार के नजरिये से कोरोना और लॉक डाउन.
विजय वर्मा :
हाँ कोरोना और लॉक डाउन ने बहुत लोगों को तकलीफ पहुचाई है. एक कलाकार के नजरिये से कहूं तो इसने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव डाला है.हमें परिवार की अहमियत और समय से वाकिफ कराया है.
वर्तमान में मायानगरी मुंबई में सपरिवार निवास करते हैं.
मुख्य बस स्टैंड स्थित अपने घर से कसबे की पहाड़ी के विहंगम दृश्य को देखकर चित्र बनाने की उन्हें बड़ी जिज्ञासा थी. उन्होंने इसे बनाया,प्रसिद्धी मिली,नाम कमाया और फिर पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा. इन्होने इस क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किये. मुंबई की प्रसिध्द जहाँगीर आर्ट गैलरी,सिमरोझा आर्ट गैलरी,ओबेरॉय ललित कला अकादमी राजस्थान कला स्पंदन आर्ट फरे आदि स्थानों पर अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं. इनकी पेंटिंग विदेशी सैलानिओं को खुब पसंद आती है.
विजय वर्मा परंपरागत चित्रों की वास्तविक व् आधुनिक रूप में गहरी समझ व् दक्षता रखते हैं, हमेशा कुछ नया प्रयोग करते रहते हैं. इन्होने नरेन्द्र मोदी, जोर्ज बुश,महारानी विक्टोरिया, महात्मा बुद्ध, अमिताभ बच्चन ,राजस्थानी संस्कृति पर आधारित गणगौर,पणिहारी,पशु पक्षी आदि की पेंटिंग बनाई है.
कई बड़े सितारे कैनवास पर अपनी चित्र विजय वर्मा से बनवाते है. इनकी बनायीं सबसे श्रेष्ठ भगवन महावीर की पोट्रेट की प्रदर्शनी न्यू यॉर्क में लग चुकी है. साहित्य और ऐतिहासिक पुस्तके पढने में रूचि रखते हैं. प्रवासी चेतना की प्रतिनिधि अल्पिता यादव ने उनसे बात की.
प्रवासी चेतना :
क्या आपने कभी कलाकार बनाने के लिए सोचा था,या ऐसे ही बन
गए ?
विजय वर्मा :
नहीं, मैंने कभी भी कलाकार बनने के बारे में नहीं सोचा था. मुझे बचपन से ही चित्रकारी करने में अच्छा लगता था. शायद यही कारण है की मै पेंटिंग की तरफ आकर्षित हुआ. म्यूरल आर्ट भी मुझे काफी प्रभावित किआ.
प्रवासी चेतना :
आप ने सफलता किस तरह प्राप्त की. या फिर कहे की सफल होने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?
विजय वर्मा :
सबसे पहले तो सफल होने के लिए व्यक्ति के अन्दर आत्मविश्वास की जरूरत होती है. जब आप कोई चीज बार बार करते है तो ही उसमे नया करने की प्रेरणा मिलती है. कभी-कभी क्या होता है कि हम हार मान लेते हैं, पर उस हार को हार न मानकर आगे ईमानदारी और मेहनत से कर्म करना चाहिए. तभी सफलता आपके कदम चूमती है.
प्रवासी चेतना :
यदि आप कलाकार नहीं होते तो क्या होते ?
विजय वर्मा :
यह तो कहना बड़ा कठिन है की यदि कलाकार न होता तो क्या होता ? जैसा की मैंने पहले ही कहा की पेंटिंग ने मुझे हमेशा से प्रभावित किआ है. यदि मै कलाकार नहीं होता तो शायद लेखक या फोटोग्राफर होता. क्योंकि मुझे हिंदी साहित्य में बड़ी दिलचस्पी है.
प्रवासी चेतना :
एक कलाकार के नजरिये से कोरोना और लॉक डाउन.
विजय वर्मा :
हाँ कोरोना और लॉक डाउन ने बहुत लोगों को तकलीफ पहुचाई है. एक कलाकार के नजरिये से कहूं तो इसने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव डाला है.हमें परिवार की अहमियत और समय से वाकिफ कराया है.

छोटी सी यात्रा कोंकण की : ऋषिकेश जोशी
अपने परिवारों में किसी भी मांगलिक कार्यों में कुलदेवी या देवताओं की पूजा की प्रथा है। कुलदेवी या देवता कुल या वंश के रक्षक देवी-देवता होते हैं। ये घर-परिवार या वंश-परंपरा के प्रथम पूज्य तथा मूल अधिकारी देव होते हैं। अतः प्रत्येक कार्य में इन्हें याद करना आवश्यक होता है।
माना जाता है कि हजारों वर्षों से अपने कुल को संगठित करने और उसके अतीत को संरक्षित करने के लिए ही कुलदेवी और देवताओं को एक स्थान पर स्थापित किया जाता था। वह स्थान उस वंश या कुल के लोगों का मूल स्थान होता था।
कथा विस्थापित परिवारों की
यदि परिवार सदियों से एक ही स्थान पर बसा रहे तो, कुल देवता- कुल देवी के दर्शन आसान होते हैं। पर जो परिवार विभिन्न कारणों से कई पीढ़ियों पहले दूसरे नगर या प्रदेश जा बसे हैं और वहीं के हो गए, उन्हें कुलदेवता के दर्शन के लिए प्रयत्न करने पड़ते हैं। हमारा परिवार भी ऐसा ही था, जो कम से कम पाँच पीढ़ी पहले मध्य भारत जा बसा था। कुलदेवी के मंदिर का पता लगाने में काफ़ी पापड़ बेलने पड़े, तब मालूम हुआ कि वे कोंकण के नरवण गांव में हैं।
यात्रा का योग
कब से जाने की इच्छा थी पर योग नहीं बना। अब, आठ महीने घर बैठने के बाद जब कुछ प्रवास की स्थिति बनी तो सोचा प्रारंभ देवी की यात्रा से ही किया जाए। उसी बहाने मनोरम कोंकण की छोटी यात्रा भी हो जायेगी। स्वयं कार चला कर जाने का कार्यक्रम तय किया ताकि सार्वजनिक परिवहन के भरोसे ना रहना पड़े।
नरवण, महाराष्ट्र के कोंकण तटीय जिले रत्नागिरी में है। हालांकि यह समुद्र के पास है लेकिन ऊंचाई पर है। नरवण से 40 किमी दूर स्थित गुहागर एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है अपने समुद्र किनारे (बीच) के लिए प्रसिद्ध है । इसी क्षेत्र में दो प्रसिद्ध मंदिर भी हैं, हेदवी गणेश और वेलणेश्वर।
दूसरा प्रसिद्ध पर्यटक स्थल गणपतिपुळे भी लगभग 50 किमी दूर है खाड़ी पार करके, पर वहाँ हम पहले जा चुके थे अंत: गुहागर से जाने का कार्यक्रम बनाया । सिर्फ दो दिन 29 दिसंबर को निकल 30 की रात वापसी, नव वर्ष मनाने वालों की भीड़ होने के पहले।
हमारा प्रवास
मुंबई से गुहागर 275 किमी है, जो 8-9 घंटे की यात्रा है । पूरा कोंकण भाग मनोरम तो है पर सड़कें कुछ खस्ता हाल हैं, इसलिए समय रख कर चलना ठीक था ।
सुबह-सुबह घर से निकले । मुंबई से कोंकण या गोवा जाने का सीधा रास्ता है पनवेल-गोवा राजमार्ग, पर कई वर्षों से इस सड़क का काम चल रहा, इस कारण अलग-अलग रूट लेने पड़ते हैं। हम लोग पहले मुंबई- पुणे एक्सप्रेसवे से खोपोली तक गए, वहाँ से पाली जाने वाला रास्ता पकड़ा। सुबह के आठ बजे थे, मुंबई के मुकाबले ठंड भी थी, एक प्याली गरम चाय की जरूरत थी। इमैजिका, जो इसी रास्ते पर है, के सामने चाय के लिए पहला विश्राम लिया। एक समय भारी चहल पहल वाली जगह सूनसान थी, मालूम नहीं दोबारा शुरु हुआ क्या, शायद नहीं।
उसके बाद पाली (बल्लालेश्वर अष्ट विनायक) होते हुए हम कोलाड के पास गोवा राजमार्ग पर लगे और महाड तक पहुंचे। सामान्य मार्ग महाड से चिपलुण जा कर था, पर गूगल मैप ने कोंकण के अंदर से जाने का सुझाव दिया तो गाड़ी मोड़ ली। महाड के आगे निकल कर, घने पेड़ों के बीच हमें एक होटल मिला । समय भी 11 बज रहे थे और भूख लग रही थी। उस होटल चलाने वाले के परिवार की महिलाओं ने घरेलू व्यंजन गरम -गरम बना कर दिए। छक कर नाश्ता किया और फिर आगे बढ़े।
अब राजमार्ग छोड़ने के कारण ट्रैफिक एक दम कम था । रास्ता कहीं पर अच्छा और कहीं ऊबड़ खाबड़ था। प्रदेश की सुंदरता और रास्ते के गड्ढ़ों के बीच तालमेल बनाते हुए गाड़ी चलाना चुनौती पूर्ण था । वैसे पूरा कोंकण भाग पहाड़ियाँ और उतार चढ़ाव से भरा हुआ है। इन दो दिनों में हमने ना जाने कितनी घाटियाँ चढ़ी और उतरी होंगी ।
हम कुछ समय में दापोली नगर पहुंचे, जहाँ एक प्रमुख बंदरगाह भी है , मछली निर्यात का बड़ा स्थान है। वहाँ से समुद्र के समांतर चलना शुरु किया, दापोली से बाहर चल एक काजू बनाने वाली फैक्टरी के विज्ञापन कई जगह थे, एक ब्रेक का भी समय हो चला था, तो रुक गए । अच्छी जगह थी, आप फैक्टरी में देख सकते हैं कि वे काजू किस तरह से अलग कर उसकी पैकिंग इत्यादि करते हैं , साथ ही काजू खरीद भी सकते हैं। हमने अपने सामान्य ज्ञान में वृद्धि की और अच्छी किस्म के काजू भी खरीदे।
चलते हुए हम दाभोल पहुंचे। जगह तो छोटी सी है पर एक जमाने में दाभोल एनरॉन के बिजली संयंत्र के कारण काफी सुर्खियों में था। गाड़ी चलाते हुए जब हमने दाभोल के आगे पहुंचे तो मज़ेदार किस्सा हुआ, नक्शे में तो रास्ता दिख रहा था पर सामने रास्ता गायब था। वहाँ था गहरा समुद्र (या कहें खाड़ी)। पता चला कि हम लोग फेरी पाईंट पर पहुंच गए हैं, वहाँ से हमारी कार फेरी में सवार होकर समुद्र पार करेगी । यह एक नया अनुभव था, एक फेरी बोट अभी ही गई थी, आधा घंटे इंतज़ार के बाद दूसरी मिली। सफर छोटा सा था केवल 5-10 मिनिट दूसरे किनारे उतर कर फिर प्रवास शुरु। कोंकण किनारे पर, इस तरह के कम से कम तीन स्थान हैं जहाँ आप फेरी से समुद्र पार कर सकते हैं। काफ़ी किफायत है, हमें रु.165 का टिकट लगा, कार और प्रवासी मिला कर और कम से कम 50-60 किमी का चक्कर बच गया, सड़क मार्ग से जाने का।
पहला गंतव्य - गुहागर
फेरी से उतर 40 मिनिट के प्रवास के बाद हम गुहागर नगर में थे। । लोकप्रिय पर्यटन स्थल होने के कारण यहाँ कई तरह के रिसॉर्ट, होटल और होम स्टे हैं, हर बजट के लिए रु. 1,200 से लेकर रु. 6,500 तक की रेंज में कमरा या कॉटेज मिल जाएगी। हम लोगों ने बुकिंग जिस रिसॉर्ट में की थी, वह गुहागर से 15 किमी दूर एक बांध के किनारे स्थित था । चिपलुण-गुहागर मेन रोड पर जैसे हम उसके पास पहुंचे, पता चला कि सड़क चौड़ी करण के लिए मार्ग बंद था। पूछताछ के बाद एक 10 किमी लंबा चक्कर लगा कर जंगल के कच्चे रास्तों से होकर हम वहाँ पहुंचे।
रिसॉर्ट अच्छा था, कमरे में पहुंचे तो दोपहर के चार बज रहे थे। पहले सोचा था कि शाम को गुहागर के समुद्र किनारे पर घूमने चलेंगे, पर अंधेरा होने के बाद जंगल के रास्ते लौटने में रास्ता चूकने की खासी संभावना थी। इस कारण शाम को गुहागर बीच जाने का कार्यक्रम रद्द कर, लेक के किनारे पर सूर्यास्त का आनंद लिया। वैसे भी यात्रा का प्रयोजन देव दर्शन का था- जो अगले दिन करना था। रात्रि भोजन ठीक था, स्थानीय पदार्थों का स्वाद मिला।
30 तारीख, दर्शन देवी का
सुबह उठ कर लेक किनारे चहलकदमी की, समुद्र के पास होने से ठंड नहीं थी । नाश्ता होटल के किराए में शामिल था, उसे कैसे छोड़ते? सफ़र भी लंबा था इस लिए नाश्ता कर, होटल से सामान बांध हम निकले। वहाँ नरवण करीब एक घंटे का रास्ता था, रास्ते में हेदवी का प्रसिद्ध गणेश मंदिर है ,जो पहला विश्राम था ।
हेदवी गणेश मंदिर
हेदवी का यह मंदिर पेशवा काल में बना हुआ है । यहाँ “दशभुज लक्ष्मी गणेश” की मूर्ति है, जो दुर्लभ है। गणेश जी के हाथों में त्रिशूल, धनुष, गदा, चक्र, शंख, परशु ये शस्त्र हैं और अन्य साज सामान। यह संगमरमर से बनी मूर्ति अत्यंत सुंदर है, इस प्रकार की शस्त्रधारी प्रतिमा कहीं और देखने नहीं मिलती। कहा जाता है कि यह मूर्ति काश्मीर में बनाई गई थी।
मंदिर सड़क से काफ़ी ऊंचाई पर स्थित है, ऊपर आने के लिए सीढ़ियाँ और वाहन मार्ग दोनों हैं। मंदिर से आस-पास का विहंगम दृश्य मिलता है।
व्याघ्रांबरी देवी मंदिर, नरवण
हेदवी मंदिर से नरवण केवल 4 किमी दूर है, थोड़ी ही देर में हम नरवण गाँव में थे। हमारी कुलदेवी माता व्याघ्रांबरी, ग्राम देवता होने के कारण मंदिर खोजने में कोई परेशानी नहीं हुई। नरवण गाव में भी काफी उतार चढ़ाव हैं। मंदिर तक जाने के लिए कई सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं, थोड़ी हिम्मत कर, कार भी मंदिर के पास एक कठिन सड़क से पहुंच गई।
यह मंदिर करीब 500 वर्ष पुराना है। कोंकण की पारंपरिक शैली में बने इस मंदिर की पूरी बनावट लकड़ी की है। बड़ी सुंदर कलाकारी है और पूरे निर्माण में कहीं भी कीलों का प्रयोग नहीं है। इतने सालों बाद भी कहते हैं, लकड़ी वैसे की वैसी है, कोई दीमक नहीं लगी। मूर्तियाँ पत्थर को तराश कर बनाई गई हैं और सन 2017 में मंदिर की मूर्तियों का जीर्णोद्धार किया गया था। गाँव के विभिन्न परिवारों में मंदिर से संबंधित कार्य बंटे हुए हैं जो उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी श्रद्धा से करते आएं हैं।
मंदिर परिसर में पहुंच कर मन प्रसन्न हो गया, काफ़ी बड़ा मैदान है जिसके बीच मंदिर स्थित है। जब हम पहुंचे तो कई स्थानीय लोग मंदिर में थे अपनी-अपनी मानता लेकर, किसी के घर शादी थी तो किसी का प्रोपर्टी का झगड़ा था। फोन पर बात होने के कारण पंडित जी ने हमें पहचान लिया और बिठा कर मनोभाव से पूजा करवाई। देवी मां के दर्शन कर बहुत अच्छा लगा , कब से जाने की सोच रखी थी।
श्री वेलणेश्वर मंदिर और समुद्र किनारा
नरवण में एक घंटा व्यतीत करने के बाद, हम वेलणेश्वर के लिए निकले जो 20 किमी की दूरी पर था। वहाँ का बीच भी बहुत सुंदर है। वेलणेश्वर गाँव का इतिहास 1200 साल का है।
यह काल-भैरव (शिव) का मंदिर समुद्र किनारे स्थित है। मंदिर का गर्भगृह प्राचीन कालीन है, पर आस पास का भाग लगभग 400 साल पहले बनाया हुआ है, जो कोंकण के अधिकांश मंदिरों जैसा खपरैल की छत वाला है। मंदिर का दीप स्तंभ देखने लायक है।
अगर आप मंदिर जाएं तो समुद्र किनारा पास ही है। समुद्र में जाने का मोह होना स्वाभाविक है। वैसे भी पहले दिन हमारा बीच जाने का कार्यक्रम फुस्स हो गया था। वहाँ कुछ पर्यटक भी थे जो समुद्र स्नान का आनंद ले रहे थे, हमने स्नान तो नहीं पर पानी में उतरने का मजा लिया।
वैसे देखें तो वेलणेश्वर, नरवण से गुहागर के मुकाबले काफ़ी पास है। इस जगह कई होटल भी दिखे, कुछ बड़े भी थे, पास ही एक भव्य इंजीनियरिंग कालेज भी है। पर उन होटलों की हालत कुछ दयनीय सी लगी, अगर अच्छा होटल मिले तो, गुहागर के मुकाबले यहाँ रहना बेहतर रहता। अब तक दोपहर के 12.30 बज चुके थे, समय था लौटने का।
वापसी की यात्रा
वापसी की यात्रा हमेशा बोर होती है, जो उत्साह जाते समय होता है वह हवा हो चुका होता है। फिर इस मनोरम भाग से कंकरीट के जंगल सी मुंबई लौटना आकर्षक तो नहीं था । इस बार हमने कोंकण के अंदर का रास्ता ना लेकर, चिपलुण से गोवा-मुंबई राजमार्ग पकड़ा।
कुछ समय चलने के बाद हम लोटे परशुराम से गुज़र रहे थे, दो बज चुके थे और सुबह का मुफ़्त का नाश्ता कब का पच चुका था। किसी अच्छे होटल की तलाश शुरु की, होटल के सामने खड़ी गाड़ियां उस की लोकप्रियता की परिचायक होती हैं। एक ऐसी ही जगह हम घुसे, बाहर गाड़ियां तो थीं पर अंदर लोग काफ़ी कम, हमें कुछ निराशा हुई । जब मेनु पूछा तो उसने मटर पनीर, बटर पनीर, पालक पनीर जैसा “राष्ट्रीय” मेनु बताया, हमने स्थानीय व्यंजनों की इच्छा व्यक्त की । मानना पड़ेगा, उसने तुरंत दुकान से सामान मंगा कर, हमारे लिए चावल की भाकरी (रोटी) और बैंगन की सब्जी बनाई , जो उसके मटर पनीर वाले मेनु से स्वादिष्ट थी।
अगला सफ़र , राजमार्ग होने के कारण व्यस्त ट्रैफिक में था । दूसरा ब्रेक लिया अंधेरा होने के बाद नागोठणे के पास, कामत होटल में। एक सांबर वड़ा और कड़क काफ़ी ने ताज़ा दम कर दिया बाकी प्रवास के लिए। यहाँ भी मेहमाननवाजी का एक अच्छा नमूना देखा। वहाँ मसाले के स्टॉल से श्रीमती जी ने थालीपीट बनाने का आटा खरीदा, उससे पूछा कि क्या वह ताज़ा और अच्छा है, उसने कहा कि हमारे होटल में आज एक शादी है और वहाँ के मेनु में यही पदार्थ है। तुरंत उसने स्वाद के लिए हमें शादी के मंडप से एक प्लेट में मंगा कर (मुफ़्त में) खिलाया। तसल्ली कर हम अगले प्रवास पर चले।
कलंबोली के पास जो बड़ा जंक्शन है, वहाँ जब 20 मिनिट ट्रैफिक जाम में अटके रहे तो एहसास हुआ कि हम मुंबई वापस आ गए। घर में कदम रखा तो घड़ी में रात के 9.30 बजे थे। रात जब सोए तो कोंकण के दृश्य सपनों में आते रहे।
माना जाता है कि हजारों वर्षों से अपने कुल को संगठित करने और उसके अतीत को संरक्षित करने के लिए ही कुलदेवी और देवताओं को एक स्थान पर स्थापित किया जाता था। वह स्थान उस वंश या कुल के लोगों का मूल स्थान होता था।
कथा विस्थापित परिवारों की
यदि परिवार सदियों से एक ही स्थान पर बसा रहे तो, कुल देवता- कुल देवी के दर्शन आसान होते हैं। पर जो परिवार विभिन्न कारणों से कई पीढ़ियों पहले दूसरे नगर या प्रदेश जा बसे हैं और वहीं के हो गए, उन्हें कुलदेवता के दर्शन के लिए प्रयत्न करने पड़ते हैं। हमारा परिवार भी ऐसा ही था, जो कम से कम पाँच पीढ़ी पहले मध्य भारत जा बसा था। कुलदेवी के मंदिर का पता लगाने में काफ़ी पापड़ बेलने पड़े, तब मालूम हुआ कि वे कोंकण के नरवण गांव में हैं।
यात्रा का योग
कब से जाने की इच्छा थी पर योग नहीं बना। अब, आठ महीने घर बैठने के बाद जब कुछ प्रवास की स्थिति बनी तो सोचा प्रारंभ देवी की यात्रा से ही किया जाए। उसी बहाने मनोरम कोंकण की छोटी यात्रा भी हो जायेगी। स्वयं कार चला कर जाने का कार्यक्रम तय किया ताकि सार्वजनिक परिवहन के भरोसे ना रहना पड़े।
नरवण, महाराष्ट्र के कोंकण तटीय जिले रत्नागिरी में है। हालांकि यह समुद्र के पास है लेकिन ऊंचाई पर है। नरवण से 40 किमी दूर स्थित गुहागर एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है अपने समुद्र किनारे (बीच) के लिए प्रसिद्ध है । इसी क्षेत्र में दो प्रसिद्ध मंदिर भी हैं, हेदवी गणेश और वेलणेश्वर।
दूसरा प्रसिद्ध पर्यटक स्थल गणपतिपुळे भी लगभग 50 किमी दूर है खाड़ी पार करके, पर वहाँ हम पहले जा चुके थे अंत: गुहागर से जाने का कार्यक्रम बनाया । सिर्फ दो दिन 29 दिसंबर को निकल 30 की रात वापसी, नव वर्ष मनाने वालों की भीड़ होने के पहले।
हमारा प्रवास
मुंबई से गुहागर 275 किमी है, जो 8-9 घंटे की यात्रा है । पूरा कोंकण भाग मनोरम तो है पर सड़कें कुछ खस्ता हाल हैं, इसलिए समय रख कर चलना ठीक था ।
सुबह-सुबह घर से निकले । मुंबई से कोंकण या गोवा जाने का सीधा रास्ता है पनवेल-गोवा राजमार्ग, पर कई वर्षों से इस सड़क का काम चल रहा, इस कारण अलग-अलग रूट लेने पड़ते हैं। हम लोग पहले मुंबई- पुणे एक्सप्रेसवे से खोपोली तक गए, वहाँ से पाली जाने वाला रास्ता पकड़ा। सुबह के आठ बजे थे, मुंबई के मुकाबले ठंड भी थी, एक प्याली गरम चाय की जरूरत थी। इमैजिका, जो इसी रास्ते पर है, के सामने चाय के लिए पहला विश्राम लिया। एक समय भारी चहल पहल वाली जगह सूनसान थी, मालूम नहीं दोबारा शुरु हुआ क्या, शायद नहीं।
उसके बाद पाली (बल्लालेश्वर अष्ट विनायक) होते हुए हम कोलाड के पास गोवा राजमार्ग पर लगे और महाड तक पहुंचे। सामान्य मार्ग महाड से चिपलुण जा कर था, पर गूगल मैप ने कोंकण के अंदर से जाने का सुझाव दिया तो गाड़ी मोड़ ली। महाड के आगे निकल कर, घने पेड़ों के बीच हमें एक होटल मिला । समय भी 11 बज रहे थे और भूख लग रही थी। उस होटल चलाने वाले के परिवार की महिलाओं ने घरेलू व्यंजन गरम -गरम बना कर दिए। छक कर नाश्ता किया और फिर आगे बढ़े।
अब राजमार्ग छोड़ने के कारण ट्रैफिक एक दम कम था । रास्ता कहीं पर अच्छा और कहीं ऊबड़ खाबड़ था। प्रदेश की सुंदरता और रास्ते के गड्ढ़ों के बीच तालमेल बनाते हुए गाड़ी चलाना चुनौती पूर्ण था । वैसे पूरा कोंकण भाग पहाड़ियाँ और उतार चढ़ाव से भरा हुआ है। इन दो दिनों में हमने ना जाने कितनी घाटियाँ चढ़ी और उतरी होंगी ।
हम कुछ समय में दापोली नगर पहुंचे, जहाँ एक प्रमुख बंदरगाह भी है , मछली निर्यात का बड़ा स्थान है। वहाँ से समुद्र के समांतर चलना शुरु किया, दापोली से बाहर चल एक काजू बनाने वाली फैक्टरी के विज्ञापन कई जगह थे, एक ब्रेक का भी समय हो चला था, तो रुक गए । अच्छी जगह थी, आप फैक्टरी में देख सकते हैं कि वे काजू किस तरह से अलग कर उसकी पैकिंग इत्यादि करते हैं , साथ ही काजू खरीद भी सकते हैं। हमने अपने सामान्य ज्ञान में वृद्धि की और अच्छी किस्म के काजू भी खरीदे।
चलते हुए हम दाभोल पहुंचे। जगह तो छोटी सी है पर एक जमाने में दाभोल एनरॉन के बिजली संयंत्र के कारण काफी सुर्खियों में था। गाड़ी चलाते हुए जब हमने दाभोल के आगे पहुंचे तो मज़ेदार किस्सा हुआ, नक्शे में तो रास्ता दिख रहा था पर सामने रास्ता गायब था। वहाँ था गहरा समुद्र (या कहें खाड़ी)। पता चला कि हम लोग फेरी पाईंट पर पहुंच गए हैं, वहाँ से हमारी कार फेरी में सवार होकर समुद्र पार करेगी । यह एक नया अनुभव था, एक फेरी बोट अभी ही गई थी, आधा घंटे इंतज़ार के बाद दूसरी मिली। सफर छोटा सा था केवल 5-10 मिनिट दूसरे किनारे उतर कर फिर प्रवास शुरु। कोंकण किनारे पर, इस तरह के कम से कम तीन स्थान हैं जहाँ आप फेरी से समुद्र पार कर सकते हैं। काफ़ी किफायत है, हमें रु.165 का टिकट लगा, कार और प्रवासी मिला कर और कम से कम 50-60 किमी का चक्कर बच गया, सड़क मार्ग से जाने का।
पहला गंतव्य - गुहागर
फेरी से उतर 40 मिनिट के प्रवास के बाद हम गुहागर नगर में थे। । लोकप्रिय पर्यटन स्थल होने के कारण यहाँ कई तरह के रिसॉर्ट, होटल और होम स्टे हैं, हर बजट के लिए रु. 1,200 से लेकर रु. 6,500 तक की रेंज में कमरा या कॉटेज मिल जाएगी। हम लोगों ने बुकिंग जिस रिसॉर्ट में की थी, वह गुहागर से 15 किमी दूर एक बांध के किनारे स्थित था । चिपलुण-गुहागर मेन रोड पर जैसे हम उसके पास पहुंचे, पता चला कि सड़क चौड़ी करण के लिए मार्ग बंद था। पूछताछ के बाद एक 10 किमी लंबा चक्कर लगा कर जंगल के कच्चे रास्तों से होकर हम वहाँ पहुंचे।
रिसॉर्ट अच्छा था, कमरे में पहुंचे तो दोपहर के चार बज रहे थे। पहले सोचा था कि शाम को गुहागर के समुद्र किनारे पर घूमने चलेंगे, पर अंधेरा होने के बाद जंगल के रास्ते लौटने में रास्ता चूकने की खासी संभावना थी। इस कारण शाम को गुहागर बीच जाने का कार्यक्रम रद्द कर, लेक के किनारे पर सूर्यास्त का आनंद लिया। वैसे भी यात्रा का प्रयोजन देव दर्शन का था- जो अगले दिन करना था। रात्रि भोजन ठीक था, स्थानीय पदार्थों का स्वाद मिला।
30 तारीख, दर्शन देवी का
सुबह उठ कर लेक किनारे चहलकदमी की, समुद्र के पास होने से ठंड नहीं थी । नाश्ता होटल के किराए में शामिल था, उसे कैसे छोड़ते? सफ़र भी लंबा था इस लिए नाश्ता कर, होटल से सामान बांध हम निकले। वहाँ नरवण करीब एक घंटे का रास्ता था, रास्ते में हेदवी का प्रसिद्ध गणेश मंदिर है ,जो पहला विश्राम था ।
हेदवी गणेश मंदिर
हेदवी का यह मंदिर पेशवा काल में बना हुआ है । यहाँ “दशभुज लक्ष्मी गणेश” की मूर्ति है, जो दुर्लभ है। गणेश जी के हाथों में त्रिशूल, धनुष, गदा, चक्र, शंख, परशु ये शस्त्र हैं और अन्य साज सामान। यह संगमरमर से बनी मूर्ति अत्यंत सुंदर है, इस प्रकार की शस्त्रधारी प्रतिमा कहीं और देखने नहीं मिलती। कहा जाता है कि यह मूर्ति काश्मीर में बनाई गई थी।
मंदिर सड़क से काफ़ी ऊंचाई पर स्थित है, ऊपर आने के लिए सीढ़ियाँ और वाहन मार्ग दोनों हैं। मंदिर से आस-पास का विहंगम दृश्य मिलता है।
व्याघ्रांबरी देवी मंदिर, नरवण
हेदवी मंदिर से नरवण केवल 4 किमी दूर है, थोड़ी ही देर में हम नरवण गाँव में थे। हमारी कुलदेवी माता व्याघ्रांबरी, ग्राम देवता होने के कारण मंदिर खोजने में कोई परेशानी नहीं हुई। नरवण गाव में भी काफी उतार चढ़ाव हैं। मंदिर तक जाने के लिए कई सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं, थोड़ी हिम्मत कर, कार भी मंदिर के पास एक कठिन सड़क से पहुंच गई।
यह मंदिर करीब 500 वर्ष पुराना है। कोंकण की पारंपरिक शैली में बने इस मंदिर की पूरी बनावट लकड़ी की है। बड़ी सुंदर कलाकारी है और पूरे निर्माण में कहीं भी कीलों का प्रयोग नहीं है। इतने सालों बाद भी कहते हैं, लकड़ी वैसे की वैसी है, कोई दीमक नहीं लगी। मूर्तियाँ पत्थर को तराश कर बनाई गई हैं और सन 2017 में मंदिर की मूर्तियों का जीर्णोद्धार किया गया था। गाँव के विभिन्न परिवारों में मंदिर से संबंधित कार्य बंटे हुए हैं जो उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी श्रद्धा से करते आएं हैं।
मंदिर परिसर में पहुंच कर मन प्रसन्न हो गया, काफ़ी बड़ा मैदान है जिसके बीच मंदिर स्थित है। जब हम पहुंचे तो कई स्थानीय लोग मंदिर में थे अपनी-अपनी मानता लेकर, किसी के घर शादी थी तो किसी का प्रोपर्टी का झगड़ा था। फोन पर बात होने के कारण पंडित जी ने हमें पहचान लिया और बिठा कर मनोभाव से पूजा करवाई। देवी मां के दर्शन कर बहुत अच्छा लगा , कब से जाने की सोच रखी थी।
श्री वेलणेश्वर मंदिर और समुद्र किनारा
नरवण में एक घंटा व्यतीत करने के बाद, हम वेलणेश्वर के लिए निकले जो 20 किमी की दूरी पर था। वहाँ का बीच भी बहुत सुंदर है। वेलणेश्वर गाँव का इतिहास 1200 साल का है।
यह काल-भैरव (शिव) का मंदिर समुद्र किनारे स्थित है। मंदिर का गर्भगृह प्राचीन कालीन है, पर आस पास का भाग लगभग 400 साल पहले बनाया हुआ है, जो कोंकण के अधिकांश मंदिरों जैसा खपरैल की छत वाला है। मंदिर का दीप स्तंभ देखने लायक है।
अगर आप मंदिर जाएं तो समुद्र किनारा पास ही है। समुद्र में जाने का मोह होना स्वाभाविक है। वैसे भी पहले दिन हमारा बीच जाने का कार्यक्रम फुस्स हो गया था। वहाँ कुछ पर्यटक भी थे जो समुद्र स्नान का आनंद ले रहे थे, हमने स्नान तो नहीं पर पानी में उतरने का मजा लिया।
वैसे देखें तो वेलणेश्वर, नरवण से गुहागर के मुकाबले काफ़ी पास है। इस जगह कई होटल भी दिखे, कुछ बड़े भी थे, पास ही एक भव्य इंजीनियरिंग कालेज भी है। पर उन होटलों की हालत कुछ दयनीय सी लगी, अगर अच्छा होटल मिले तो, गुहागर के मुकाबले यहाँ रहना बेहतर रहता। अब तक दोपहर के 12.30 बज चुके थे, समय था लौटने का।
वापसी की यात्रा
वापसी की यात्रा हमेशा बोर होती है, जो उत्साह जाते समय होता है वह हवा हो चुका होता है। फिर इस मनोरम भाग से कंकरीट के जंगल सी मुंबई लौटना आकर्षक तो नहीं था । इस बार हमने कोंकण के अंदर का रास्ता ना लेकर, चिपलुण से गोवा-मुंबई राजमार्ग पकड़ा।
कुछ समय चलने के बाद हम लोटे परशुराम से गुज़र रहे थे, दो बज चुके थे और सुबह का मुफ़्त का नाश्ता कब का पच चुका था। किसी अच्छे होटल की तलाश शुरु की, होटल के सामने खड़ी गाड़ियां उस की लोकप्रियता की परिचायक होती हैं। एक ऐसी ही जगह हम घुसे, बाहर गाड़ियां तो थीं पर अंदर लोग काफ़ी कम, हमें कुछ निराशा हुई । जब मेनु पूछा तो उसने मटर पनीर, बटर पनीर, पालक पनीर जैसा “राष्ट्रीय” मेनु बताया, हमने स्थानीय व्यंजनों की इच्छा व्यक्त की । मानना पड़ेगा, उसने तुरंत दुकान से सामान मंगा कर, हमारे लिए चावल की भाकरी (रोटी) और बैंगन की सब्जी बनाई , जो उसके मटर पनीर वाले मेनु से स्वादिष्ट थी।
अगला सफ़र , राजमार्ग होने के कारण व्यस्त ट्रैफिक में था । दूसरा ब्रेक लिया अंधेरा होने के बाद नागोठणे के पास, कामत होटल में। एक सांबर वड़ा और कड़क काफ़ी ने ताज़ा दम कर दिया बाकी प्रवास के लिए। यहाँ भी मेहमाननवाजी का एक अच्छा नमूना देखा। वहाँ मसाले के स्टॉल से श्रीमती जी ने थालीपीट बनाने का आटा खरीदा, उससे पूछा कि क्या वह ताज़ा और अच्छा है, उसने कहा कि हमारे होटल में आज एक शादी है और वहाँ के मेनु में यही पदार्थ है। तुरंत उसने स्वाद के लिए हमें शादी के मंडप से एक प्लेट में मंगा कर (मुफ़्त में) खिलाया। तसल्ली कर हम अगले प्रवास पर चले।
कलंबोली के पास जो बड़ा जंक्शन है, वहाँ जब 20 मिनिट ट्रैफिक जाम में अटके रहे तो एहसास हुआ कि हम मुंबई वापस आ गए। घर में कदम रखा तो घड़ी में रात के 9.30 बजे थे। रात जब सोए तो कोंकण के दृश्य सपनों में आते रहे।

महादेवी वर्मा
मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
महादेवी वर्मा
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!
महादेवी वर्मा

माँ और शिक्षा : श्रीमती मंजू लोढ़ा
मेरी मां कम पढ़ी लिखी थी ,
पर किसी महाविद्यालय से कम न थी,
मां से सीखी जो शिक्षा
वह दुनिया के किसी विज्ञान शाला में नहीं मिल सकती।
याद है बचपन की उनकी वह बात,
जब आसमान के चमकते हुए तारों को मुझे देखते हुए वह बोली थी,"
बेटा सिर्फ चमकते हुए तारों को मत देखो, एक दिन स्वयं तारा बनो और
सितारा बनकर चमको"।
उसी बात ने जीवन को दी ,
एक नई दिशा ,कुछ बनने की ललक।
मां से ही सीखा प्रथम सबक दान देने का,
किसी के काम आने का।
मां से ही सीखा धर्म और धार्मिक क्रियाएं । मां से ही सीखी दुनियादारी, मां से ही सीखी सहनशीलता और रिश्ता निभाने की रीत।
मैं अपने जीवन में जो कुछ हूं
वह सब प्यारी ममतामयी मां से ही हूं ।
उसके ऋण से तो मैं कभी उऋण नहीं हो सकती । बच्चे की प्रथम गुरु होती है मां,
सौ शिक्षक से बढ़़कर होती है एक मां।
वह जीजाबाई ही थी, वह जयवंती बाई थी ,जिन्होंने वीर शिवा और प्रताप जैसे ऐतिहासिक वीरों को गढ़ा। मां ही है
दुनिया की एकमेव प्रयोगशाला
जहां घड़ा जाता है सुसंस्कारित बचपन।
मां न होती तो कैसे बच्चों में पढ़ती संस्कारों की अमूल्य निधि, मां न होती तो कैसे भीगते ममता की छांव में।
मां से ही है मेरा वजूद, मां से ही हूं मैं और मुझ में ही है मेरी मां । मां से बड़ा कोई शिक्षक नहीं,
कोई पाठशाला नहीं, कोई महाविद्यालय नहीं, मां अपने आप में संपूर्ण शिक्षा प्रणाली है। भगवान के बाद भगवान का दूसरा रूप है मां
मंजु लोढ़ा
पर किसी महाविद्यालय से कम न थी,
मां से सीखी जो शिक्षा
वह दुनिया के किसी विज्ञान शाला में नहीं मिल सकती।
याद है बचपन की उनकी वह बात,
जब आसमान के चमकते हुए तारों को मुझे देखते हुए वह बोली थी,"
बेटा सिर्फ चमकते हुए तारों को मत देखो, एक दिन स्वयं तारा बनो और
सितारा बनकर चमको"।
उसी बात ने जीवन को दी ,
एक नई दिशा ,कुछ बनने की ललक।
मां से ही सीखा प्रथम सबक दान देने का,
किसी के काम आने का।
मां से ही सीखा धर्म और धार्मिक क्रियाएं । मां से ही सीखी दुनियादारी, मां से ही सीखी सहनशीलता और रिश्ता निभाने की रीत।
मैं अपने जीवन में जो कुछ हूं
वह सब प्यारी ममतामयी मां से ही हूं ।
उसके ऋण से तो मैं कभी उऋण नहीं हो सकती । बच्चे की प्रथम गुरु होती है मां,
सौ शिक्षक से बढ़़कर होती है एक मां।
वह जीजाबाई ही थी, वह जयवंती बाई थी ,जिन्होंने वीर शिवा और प्रताप जैसे ऐतिहासिक वीरों को गढ़ा। मां ही है
दुनिया की एकमेव प्रयोगशाला
जहां घड़ा जाता है सुसंस्कारित बचपन।
मां न होती तो कैसे बच्चों में पढ़ती संस्कारों की अमूल्य निधि, मां न होती तो कैसे भीगते ममता की छांव में।
मां से ही है मेरा वजूद, मां से ही हूं मैं और मुझ में ही है मेरी मां । मां से बड़ा कोई शिक्षक नहीं,
कोई पाठशाला नहीं, कोई महाविद्यालय नहीं, मां अपने आप में संपूर्ण शिक्षा प्रणाली है। भगवान के बाद भगवान का दूसरा रूप है मां
मंजु लोढ़ा

पंचगनी
महाबलेश्वर, पंचगनी – कुछ अलग
“फ़िर से पंचगनी? कितनी बार हो आये“! श्रीमती जी ने कहा। बंगलूरु, पुणे और मुम्बई के पुराने मित्रों का साथ दो-तीन दिन मिलने का कार्यक्रम तय हुआ था। महावीर जयंती, गुड फ़्राईडे के साथ शनिवार- रविवार लगा होने से बढ़िया मौका था। कई अलग-अलग जगहों की संभावना तलाश करते-करते आखिर में पंचगनी ही तय हुआ। आने जाने में आसान और एक तरह से बंगलूरु और मुम्बई के मध्य में।
लोकप्रिय हिल स्टेशन होने के कारण, सभी लोग पहले भी पंचगनी- महाबलेश्वर जा चुके थे। अतः तय किया कि इस बार हम “दर्शनीय स्थलों” की लिस्ट के पीछे नहीं भागेंगे, टिक करते हुए कि हमने क्या-क्या देखा? आपस में समय बिताना मुख्य उद्देश्य था, अगर देखना ही होगा तो कुछ अलग देखा जाए।
सभी मित्र परिवार अलग-अलग दिशाओं से पुणे में गुरुवार की दोपहर पहुंचे और फ़िर सभी एक साथ मिनी बस में निकले पंचगनी के लिए। मार्च का महीना समाप्त प्रायः था और गर्मी हो चली थी, ऊपर पहुंच कर कुछ राहत होगी ऐसी आशा थी। वैसे तो पुणे से पंचगनी का रास्ता छोटा ही है, पर रास्ते में चाय के लिए रुकना आवश्यक था। जब चाय के साथ गरमा गरम “बटाटा वड़ा” देख तो हमारा छोटा ब्रेक कुछ लंबा ही खिंच गया।
टेबल लैंड पर सितारों का साथ
फ़िर भी शाम होने तक हम पंचगनी पहुंच गए। अभी सूरज ढला नहीं था और सभी में उत्साह था, तो तय किया कि प्रसिद्ध “टेबल लैंड” से सूर्यास्त देखा जाए। तुरंत सब निकले और सूरज ढलने के बस थोड़ी देर पहले हम टेबल लैंड पर थे।
इसकी ख्याति एशिया के दूसरे सबसे बड़े पर्वतीय पठार के रूप में है। जब यह “दूसरा” शब्द आता है तो बड़ी परेशानी होती है कि पहला कौन? जैसे चेन्नई का मरीना बीच विश्व का “दूसरा” सबसे लंबा बीच है, पहला खोजते रहो। इस लिए हमने पठार के बारे में खोजा, पता चला कि तिब्बत के पर्वतीय पठार पहले नंबर पर हैं। फ़िर ठीक लगा, तिब्बत हिमालय में है और हम सह्याद्री की पर्वत श्रृंखला पर थे।
टेबल लैंड पर घोड़ा गाड़ी या घोड़े की सवारी काफ़ी लोकप्रिय है, पर हमारा कोई ऐसा इरादा नहीं था। हाँ, सूरज ढलने के बाद एक लाइन से खड़ी घोड़ा गाड़ियाँ, बहुत ही सुंदर दिख रहीं थीं जो फ़ोटोग्राफ़ी करने के लिए बढ़िया मौका था। यहाँ पर हमेशा के घोड़े वाले, चने वाले और भुट्टे वाले के अलावा इस बार कुछ दूरबीन वाले भी देखे। उनमें से एक की मदद हमने अपना ग्रुप फोटो खींचने में ली थी, इसलिए श्रीमती जी ने आभार स्वरूप उसकी दूरबीन की सेवा लेना स्वीकार किया।
जो उन्होंने देखा, अद्भुत था। देखते-देखते हम सभी कतार से दूरबीन देखने में लग गए। अभी शाम का धुंधलका था, चाँद थोड़ा सा दिखने लगा था। पर उस दूरबीन से चांद इतने पास और स्पष्ट दिख रहा था कि हम चाँद के ऊपर के गड्ढे भी साफ़-साफ़ देख पा रहे थे। दूरबीन वाले ने चाँद के विभिन्न प्रदेशों की जानकारी दी, फ़िर उसने दूरबीन थोड़ी घुमा कर आकाश में चमकता हुआ पहला तारा दिखाया। किसी अंगूठी के हीरे जैसा जगमगा रहा था, जब दूरबीन से देखो तो, नंगी आँखों से हम तारे को देख भी नहीं पा रहे थे।
किसी वेधशाला में जा कर सितारे देखना अलग चीज़ है पर सैर पर आकर इस तरह सितारा देख सकना, अलग अनुभव था। दूरबीन वाले ने देर रात होटल आकर शनि, गुरु और बाकी तारे भी दिखाने की बात की। उसकी दूरबीन तो शक्तिशाली थी, पर हमारी रात को जागने की शक्ति नहीं थी।
देवराई- कलाकारों का गाँव
अगले दिन सुबह उठ कर देवराई की ओर जाना तय हुआ। इस कलाकारों के गाँव को बने करीब दस साल हुए हैं और इसके बनने की कहानी रोचक है। यहाँ के माथुर दंपत्ती के प्रयत्नों का यह फल है। महाराष्ट्र के गढ़ चिरौली और छत्तीसगढ़ के नक्सल पीड़ित इलाकों के कई कलाकारों को यहाँ ला कर बसाया है जो बेरोजगारी से जूझ रहे थे। उनकी कला को जीवंत रख, आजीविका की भी व्यवस्था की गई है।
सन दो हज़ार आठ में पहल श्री सुरेश पुंगाती नामक कलाकार ने की और अब पूरा कलाकारों का गाँव सा बस गया है। श्रीमती माथुर ने स्वयं हमें प्रकल्प के बारे में बताया और सुरेश जी से पहचान भी कराई। यहाँ के कलाकारों की विशेषता “डोकरा” कला है जिसमें मिश्र धातु को मिट्टी और मोम के सांचे में पेड़ पौधे या प्राणियों के आकार में ढाला जाता है। मराठी भाषा में “देवराई” का अर्थ, जंगल का एक ऐसा हिस्सा जो भगवान के नाम छोड़ा जाता है और उसे सारा समाज सम्हलता है किसी भी अतिक्रमण से। पर्यावरण संरक्षण की पुरानी परंपरा कहें।
देवराई संस्था का कार्यालय तो सड़क के पास ही है पर कलाकारों का गांव उससे करीब आधा किलोमीटर नीचे सीढ़ियाँ उतर कर है। अगर आप उन्हें पिघली धातु ढालते हुए देखना चाहते हैं तो उतनी मशक्कत करनी होगी। ऊपर संस्था का शो रूम है , जहाँ कई सारी कलाकृतियाँ प्रदर्शित हैं। शो रूम की कीमतें किसी एम्पोरियम जैसी ही हैं, अतः सस्ते में कुछ मिल जायेगा, यह विचार लेकर ना जाएं।
भिलार - पुस्तकों का गाँव
देवराई से बाहर निकलते हुए प्रसिद्ध पारसी प्वाइंट है, जिसे देख हम अगले मोर्चे पर चले जो था, भिलार गाँव। जहाँ देवराई को शुरु हुए दस साल हुए हैं, भिलार का प्रयोग बस साल भर पुराना है। महाराष्ट्र शासन के प्रोत्साहन से इसकी शुरुआत हुई है।
भिलार गांव, पंचगनी से महाबलेश्वर जाने वाले मेन रोड से करीब छह किलोमीटर अंदर जाकर है। इस प्रयोग की कल्पना ब्रिटेन के एक गाँव “हे ऑन वाय” से मिली है जिसे “पुस्तकों का शहर” के नाम से जाना जाता है। उस छोटे से शहर में दो दर्जन पुस्तकों की दुकानें हैं और हर साल साहित्य मेला भी होता है।
भिलार गाँव के कई परिवारों ने अपने घर का एक हिस्सा पुस्तकालय में बदल दिया है। हर घर में अलग-अलग विषय की पुस्तकें हैं, कहीं इतिहास, कहीं नारी साहित्य, कहीं प्रवास वर्णन, कहीं ग्रामीण कथा साहित्य। आप किसी भी घर जाकर बैठ सकते हैं और इत्मीनान से पुस्तक लेकर पढ़ सकते हैं। अगर चाहें तो घर वाले आपके लिए चाय, नाश्ता या खाना भी बना कर दे सकते है। पुस्तक पढ़ना निशुल्क है पर मेहमान नवाज़ी के लिए कुछ गिनने होंगे पर बहुत ही किफ़ायती।
भिलार में शासन ने पुस्तकें खरीदने में मदद की, गाँव के परिवारों ने अपने घरों में पुस्तकालय और बैठ कर पढ़ने की सुविधा बनाई। कुछ कलाकारों ने मिल कर गाँव में जगह-जगह पर चित्रकारी कर उसे आकर्षक बनाया। करीब पच्चीस घरों में पंद्रह हज़ार से भी अधिक पुस्तकें इस गाँव में उपलब्ध हैं।
हम सबसे पहले पहुंचे एक घर में जहाँ ऐतिहासिक पुस्तकों का संग्रह था। हमारे मेज़बान ने हमारा स्वागत किया और उत्साह से पूरे प्रकल्प के बारे में जानकारी दी। उसी समय पूरे क्षेत्र में “स्ट्रॉबेरी फ़ेस्टिवल” चल रहा था, जिसके अंतर्गत उस गाँव में “धनगरों” (गड़रिए) का समूह नृत्य होने वाला था, हमें भी उसके लिए रुकने का आग्रह किया।
समय का उपयोग करते हुए हम तीन चार घरों में गए, कुछ घरों में गर्मजोशी से स्वागत हुआ तो कुछ में मेजबान गायब थे। गाँव में एक किताबों की दुकान भी थी, पर उस दिन बंद दिखी। लौट कर हमने लोक नृत्य का आनंद लिया और साथ ही गरमा गरम चाय का भी।
अच्छा लगा प्रयोग देख कर, पर एक प्रश्न था कि क्या कोई इतनी देर बैठ पायेगा बड़ी पुस्तक लेकर पढ़ने? मेरे प्रश्न को भांपते हुए मेज़बान ने छोटी-छोटी किताबें भी दिखाईं जो एक बैठक में पढ़ी जा सकतीं है। आशा की जाए कि भिलार को प्रसिद्धि मिले तथा पुस्तक और पाठकों की संख्या में भी निरंतर वृद्धि हो।
खान पान और खरीददारी
बड़ा ग्रुप होने के कारण भोजन के लिए ऐसी जगह देखनी थी जहाँ पार्किंग की सुविधा हो तथा सादा खाना मिल सके। एक पुराना भव्य सा होटल मिला, जहाँ हमारी एक मित्र उनके बचपन में भी जा चुकीं थीं। होटल का फ़र्नीचर और वातावरण देख लगा कि जैसा हमारी मित्र ने चालीस साल पहले देखा होगा, वैसा ही आज भी है। पर खाना ताज़ा और स्वादिष्ट था, मौसम का पहला आम रस खाने को मिला। होटल के प्रबंधक या मालिक से बात हुई और जानकर आश्चर्य हुआ कि वह युवक, मुम्बई के प्रसिद्ध दादर केटरिंग कॉलेज से पढ़ा हुआ है। किसी पंचतारांकित होटल में काम करने की जगह, अपने पारिवार के ग्लैमर रहित व्यवसाय में हिस्सा बंटा रहा है।
खरीददारी का जिक्र इस लिए किया कि महाबलेश्वर में बाकी हिल स्टेशन की तरह तो दुकानें हैं ही, पर साड़ियों की एक मशहूर दुकान है। इतनी मशहूर कि कई लोग पुणे से वहाँ साड़ी खरीदने आते हैं। जाहिर था कि महिलाओं की रुचि किसी और दर्शनीय स्थल के पहले उस दुकान में जाने की थी।
बचे समय में हमने एक प्वाइंट को टिक कर ही दिया, पंचगनी लौटने के पहले।
वाई और धोम बांध
अगले दिन हमने सह्याद्री के पहाड़ से उतर, कृष्णा नदी के किनारे स्थित वाई शहर और उसके पास स्थित धोम बांध पर जाने का विचार किया। हो सकता है कि वाई शहर का नाम आपको मालूम न हो पर वाई और उसके आस पास के दृश्य, आपको जरूर पहचाने से लगेंगे। और लगें भी क्यों नहीं?
अनगिनत हिंदी फ़िल्मों में वाई, कृष्णा नदी पर बना घाट, महागणेश मंदिर पास ही स्थित पेशवा का मेणवली गाँव ये सारी जगहे फ़िल्मों में गाँव का दृश्य दिखाने के लिए उपयोग में लाईं गईं हैं। चाहे बिहार की कहानी पर आधारित “गंगाजल” हो या उत्तर की कहानी पर आधारित “स्वदेश” हो, या दक्षिण की कहानी “चेन्नई एक्सप्रेस” हो वाई कि कुछ शूटिंग जरूर मिलेगी। उसी तरह कृष्णा नदी पर बने धोम बांध के पास का भी इलाका कई फ़िल्मों में लिया गया था। चेन्नई एक्स्प्रेस में तो पूरा गांव बसाया था, वहाँ पर निर्देशक ने।
पहले मंदिर में दर्शन किए, उस दिन हनुमान जयंती भी थी तो हनुमान जी का भी मंदिर खोज निकाला। फ़िर आगे बढे हम बांध की ओर नौका विहार के लिए। यह भाग पर्यटकों में उतना लोकप्रिय नहीं जितना महाबलेश्वर। बांध में नौका विहार की सुविधा खोजते-खोजते हम काफ़ी आगे, एक दूसरे ही बांध तक पहुंच गए, फ़िर किसी ने रास्ता बताया और लौट कर आए।
जब नौका (मोटर बोट) में बैठे तो चिलचिलाती धूप थी, सूरज एकदम सिर के ऊपर था। नाव के सीटें भी तपी हुई थी, एक बार लगा कि छोड़ें नौका विहार और चलें छैंया छैंया वापस। पर जैसे ही नाव शुरु हुई तो हवा लगने लगी और पानी के थपेड़ों ने सारी गर्मी दूर कर दी। दोपहर के एक बजे भी , चांदनी रात में नौका विहार का आनंद आया।
जब तक हमारी नाव यात्रा समाप्त हुई, सभी को जोरों सी भूख लग रही थी। रास्ते में कई छोटे ढ़ाबे हैं जो आपको स्थानीय भोजन “झुणका भाकर” (ज्वार की रोटी और बेसन से बना साग) या “भरली वांगी” (भरवां बैंगन) का खाना खिलाते है। उन्हीं में से एक में हम पहुंचे और छक कर सभी ने भोजन का आनंद उठाया।
तब तक दोपहर काफ़ी हो चली थी, कहीं और जाने का विचार त्यागकर गप्पें मारते हुए वापिस पुणे ही लौटने का तय हुआ। लौटते समय हम यही सोच रहे थी कि अगर बाकी लोग पूछेंगे कि क्या देखा? तो कौन-कौन से प्वाइंट का नाम गिनाएं ?
“फ़िर से पंचगनी? कितनी बार हो आये“! श्रीमती जी ने कहा। बंगलूरु, पुणे और मुम्बई के पुराने मित्रों का साथ दो-तीन दिन मिलने का कार्यक्रम तय हुआ था। महावीर जयंती, गुड फ़्राईडे के साथ शनिवार- रविवार लगा होने से बढ़िया मौका था। कई अलग-अलग जगहों की संभावना तलाश करते-करते आखिर में पंचगनी ही तय हुआ। आने जाने में आसान और एक तरह से बंगलूरु और मुम्बई के मध्य में।
लोकप्रिय हिल स्टेशन होने के कारण, सभी लोग पहले भी पंचगनी- महाबलेश्वर जा चुके थे। अतः तय किया कि इस बार हम “दर्शनीय स्थलों” की लिस्ट के पीछे नहीं भागेंगे, टिक करते हुए कि हमने क्या-क्या देखा? आपस में समय बिताना मुख्य उद्देश्य था, अगर देखना ही होगा तो कुछ अलग देखा जाए।
सभी मित्र परिवार अलग-अलग दिशाओं से पुणे में गुरुवार की दोपहर पहुंचे और फ़िर सभी एक साथ मिनी बस में निकले पंचगनी के लिए। मार्च का महीना समाप्त प्रायः था और गर्मी हो चली थी, ऊपर पहुंच कर कुछ राहत होगी ऐसी आशा थी। वैसे तो पुणे से पंचगनी का रास्ता छोटा ही है, पर रास्ते में चाय के लिए रुकना आवश्यक था। जब चाय के साथ गरमा गरम “बटाटा वड़ा” देख तो हमारा छोटा ब्रेक कुछ लंबा ही खिंच गया।
टेबल लैंड पर सितारों का साथ
फ़िर भी शाम होने तक हम पंचगनी पहुंच गए। अभी सूरज ढला नहीं था और सभी में उत्साह था, तो तय किया कि प्रसिद्ध “टेबल लैंड” से सूर्यास्त देखा जाए। तुरंत सब निकले और सूरज ढलने के बस थोड़ी देर पहले हम टेबल लैंड पर थे।
इसकी ख्याति एशिया के दूसरे सबसे बड़े पर्वतीय पठार के रूप में है। जब यह “दूसरा” शब्द आता है तो बड़ी परेशानी होती है कि पहला कौन? जैसे चेन्नई का मरीना बीच विश्व का “दूसरा” सबसे लंबा बीच है, पहला खोजते रहो। इस लिए हमने पठार के बारे में खोजा, पता चला कि तिब्बत के पर्वतीय पठार पहले नंबर पर हैं। फ़िर ठीक लगा, तिब्बत हिमालय में है और हम सह्याद्री की पर्वत श्रृंखला पर थे।
टेबल लैंड पर घोड़ा गाड़ी या घोड़े की सवारी काफ़ी लोकप्रिय है, पर हमारा कोई ऐसा इरादा नहीं था। हाँ, सूरज ढलने के बाद एक लाइन से खड़ी घोड़ा गाड़ियाँ, बहुत ही सुंदर दिख रहीं थीं जो फ़ोटोग्राफ़ी करने के लिए बढ़िया मौका था। यहाँ पर हमेशा के घोड़े वाले, चने वाले और भुट्टे वाले के अलावा इस बार कुछ दूरबीन वाले भी देखे। उनमें से एक की मदद हमने अपना ग्रुप फोटो खींचने में ली थी, इसलिए श्रीमती जी ने आभार स्वरूप उसकी दूरबीन की सेवा लेना स्वीकार किया।
जो उन्होंने देखा, अद्भुत था। देखते-देखते हम सभी कतार से दूरबीन देखने में लग गए। अभी शाम का धुंधलका था, चाँद थोड़ा सा दिखने लगा था। पर उस दूरबीन से चांद इतने पास और स्पष्ट दिख रहा था कि हम चाँद के ऊपर के गड्ढे भी साफ़-साफ़ देख पा रहे थे। दूरबीन वाले ने चाँद के विभिन्न प्रदेशों की जानकारी दी, फ़िर उसने दूरबीन थोड़ी घुमा कर आकाश में चमकता हुआ पहला तारा दिखाया। किसी अंगूठी के हीरे जैसा जगमगा रहा था, जब दूरबीन से देखो तो, नंगी आँखों से हम तारे को देख भी नहीं पा रहे थे।
किसी वेधशाला में जा कर सितारे देखना अलग चीज़ है पर सैर पर आकर इस तरह सितारा देख सकना, अलग अनुभव था। दूरबीन वाले ने देर रात होटल आकर शनि, गुरु और बाकी तारे भी दिखाने की बात की। उसकी दूरबीन तो शक्तिशाली थी, पर हमारी रात को जागने की शक्ति नहीं थी।
देवराई- कलाकारों का गाँव
अगले दिन सुबह उठ कर देवराई की ओर जाना तय हुआ। इस कलाकारों के गाँव को बने करीब दस साल हुए हैं और इसके बनने की कहानी रोचक है। यहाँ के माथुर दंपत्ती के प्रयत्नों का यह फल है। महाराष्ट्र के गढ़ चिरौली और छत्तीसगढ़ के नक्सल पीड़ित इलाकों के कई कलाकारों को यहाँ ला कर बसाया है जो बेरोजगारी से जूझ रहे थे। उनकी कला को जीवंत रख, आजीविका की भी व्यवस्था की गई है।
सन दो हज़ार आठ में पहल श्री सुरेश पुंगाती नामक कलाकार ने की और अब पूरा कलाकारों का गाँव सा बस गया है। श्रीमती माथुर ने स्वयं हमें प्रकल्प के बारे में बताया और सुरेश जी से पहचान भी कराई। यहाँ के कलाकारों की विशेषता “डोकरा” कला है जिसमें मिश्र धातु को मिट्टी और मोम के सांचे में पेड़ पौधे या प्राणियों के आकार में ढाला जाता है। मराठी भाषा में “देवराई” का अर्थ, जंगल का एक ऐसा हिस्सा जो भगवान के नाम छोड़ा जाता है और उसे सारा समाज सम्हलता है किसी भी अतिक्रमण से। पर्यावरण संरक्षण की पुरानी परंपरा कहें।
देवराई संस्था का कार्यालय तो सड़क के पास ही है पर कलाकारों का गांव उससे करीब आधा किलोमीटर नीचे सीढ़ियाँ उतर कर है। अगर आप उन्हें पिघली धातु ढालते हुए देखना चाहते हैं तो उतनी मशक्कत करनी होगी। ऊपर संस्था का शो रूम है , जहाँ कई सारी कलाकृतियाँ प्रदर्शित हैं। शो रूम की कीमतें किसी एम्पोरियम जैसी ही हैं, अतः सस्ते में कुछ मिल जायेगा, यह विचार लेकर ना जाएं।
भिलार - पुस्तकों का गाँव
देवराई से बाहर निकलते हुए प्रसिद्ध पारसी प्वाइंट है, जिसे देख हम अगले मोर्चे पर चले जो था, भिलार गाँव। जहाँ देवराई को शुरु हुए दस साल हुए हैं, भिलार का प्रयोग बस साल भर पुराना है। महाराष्ट्र शासन के प्रोत्साहन से इसकी शुरुआत हुई है।
भिलार गांव, पंचगनी से महाबलेश्वर जाने वाले मेन रोड से करीब छह किलोमीटर अंदर जाकर है। इस प्रयोग की कल्पना ब्रिटेन के एक गाँव “हे ऑन वाय” से मिली है जिसे “पुस्तकों का शहर” के नाम से जाना जाता है। उस छोटे से शहर में दो दर्जन पुस्तकों की दुकानें हैं और हर साल साहित्य मेला भी होता है।
भिलार गाँव के कई परिवारों ने अपने घर का एक हिस्सा पुस्तकालय में बदल दिया है। हर घर में अलग-अलग विषय की पुस्तकें हैं, कहीं इतिहास, कहीं नारी साहित्य, कहीं प्रवास वर्णन, कहीं ग्रामीण कथा साहित्य। आप किसी भी घर जाकर बैठ सकते हैं और इत्मीनान से पुस्तक लेकर पढ़ सकते हैं। अगर चाहें तो घर वाले आपके लिए चाय, नाश्ता या खाना भी बना कर दे सकते है। पुस्तक पढ़ना निशुल्क है पर मेहमान नवाज़ी के लिए कुछ गिनने होंगे पर बहुत ही किफ़ायती।
भिलार में शासन ने पुस्तकें खरीदने में मदद की, गाँव के परिवारों ने अपने घरों में पुस्तकालय और बैठ कर पढ़ने की सुविधा बनाई। कुछ कलाकारों ने मिल कर गाँव में जगह-जगह पर चित्रकारी कर उसे आकर्षक बनाया। करीब पच्चीस घरों में पंद्रह हज़ार से भी अधिक पुस्तकें इस गाँव में उपलब्ध हैं।
हम सबसे पहले पहुंचे एक घर में जहाँ ऐतिहासिक पुस्तकों का संग्रह था। हमारे मेज़बान ने हमारा स्वागत किया और उत्साह से पूरे प्रकल्प के बारे में जानकारी दी। उसी समय पूरे क्षेत्र में “स्ट्रॉबेरी फ़ेस्टिवल” चल रहा था, जिसके अंतर्गत उस गाँव में “धनगरों” (गड़रिए) का समूह नृत्य होने वाला था, हमें भी उसके लिए रुकने का आग्रह किया।
समय का उपयोग करते हुए हम तीन चार घरों में गए, कुछ घरों में गर्मजोशी से स्वागत हुआ तो कुछ में मेजबान गायब थे। गाँव में एक किताबों की दुकान भी थी, पर उस दिन बंद दिखी। लौट कर हमने लोक नृत्य का आनंद लिया और साथ ही गरमा गरम चाय का भी।
अच्छा लगा प्रयोग देख कर, पर एक प्रश्न था कि क्या कोई इतनी देर बैठ पायेगा बड़ी पुस्तक लेकर पढ़ने? मेरे प्रश्न को भांपते हुए मेज़बान ने छोटी-छोटी किताबें भी दिखाईं जो एक बैठक में पढ़ी जा सकतीं है। आशा की जाए कि भिलार को प्रसिद्धि मिले तथा पुस्तक और पाठकों की संख्या में भी निरंतर वृद्धि हो।
खान पान और खरीददारी
बड़ा ग्रुप होने के कारण भोजन के लिए ऐसी जगह देखनी थी जहाँ पार्किंग की सुविधा हो तथा सादा खाना मिल सके। एक पुराना भव्य सा होटल मिला, जहाँ हमारी एक मित्र उनके बचपन में भी जा चुकीं थीं। होटल का फ़र्नीचर और वातावरण देख लगा कि जैसा हमारी मित्र ने चालीस साल पहले देखा होगा, वैसा ही आज भी है। पर खाना ताज़ा और स्वादिष्ट था, मौसम का पहला आम रस खाने को मिला। होटल के प्रबंधक या मालिक से बात हुई और जानकर आश्चर्य हुआ कि वह युवक, मुम्बई के प्रसिद्ध दादर केटरिंग कॉलेज से पढ़ा हुआ है। किसी पंचतारांकित होटल में काम करने की जगह, अपने पारिवार के ग्लैमर रहित व्यवसाय में हिस्सा बंटा रहा है।
खरीददारी का जिक्र इस लिए किया कि महाबलेश्वर में बाकी हिल स्टेशन की तरह तो दुकानें हैं ही, पर साड़ियों की एक मशहूर दुकान है। इतनी मशहूर कि कई लोग पुणे से वहाँ साड़ी खरीदने आते हैं। जाहिर था कि महिलाओं की रुचि किसी और दर्शनीय स्थल के पहले उस दुकान में जाने की थी।
बचे समय में हमने एक प्वाइंट को टिक कर ही दिया, पंचगनी लौटने के पहले।
वाई और धोम बांध
अगले दिन हमने सह्याद्री के पहाड़ से उतर, कृष्णा नदी के किनारे स्थित वाई शहर और उसके पास स्थित धोम बांध पर जाने का विचार किया। हो सकता है कि वाई शहर का नाम आपको मालूम न हो पर वाई और उसके आस पास के दृश्य, आपको जरूर पहचाने से लगेंगे। और लगें भी क्यों नहीं?
अनगिनत हिंदी फ़िल्मों में वाई, कृष्णा नदी पर बना घाट, महागणेश मंदिर पास ही स्थित पेशवा का मेणवली गाँव ये सारी जगहे फ़िल्मों में गाँव का दृश्य दिखाने के लिए उपयोग में लाईं गईं हैं। चाहे बिहार की कहानी पर आधारित “गंगाजल” हो या उत्तर की कहानी पर आधारित “स्वदेश” हो, या दक्षिण की कहानी “चेन्नई एक्सप्रेस” हो वाई कि कुछ शूटिंग जरूर मिलेगी। उसी तरह कृष्णा नदी पर बने धोम बांध के पास का भी इलाका कई फ़िल्मों में लिया गया था। चेन्नई एक्स्प्रेस में तो पूरा गांव बसाया था, वहाँ पर निर्देशक ने।
पहले मंदिर में दर्शन किए, उस दिन हनुमान जयंती भी थी तो हनुमान जी का भी मंदिर खोज निकाला। फ़िर आगे बढे हम बांध की ओर नौका विहार के लिए। यह भाग पर्यटकों में उतना लोकप्रिय नहीं जितना महाबलेश्वर। बांध में नौका विहार की सुविधा खोजते-खोजते हम काफ़ी आगे, एक दूसरे ही बांध तक पहुंच गए, फ़िर किसी ने रास्ता बताया और लौट कर आए।
जब नौका (मोटर बोट) में बैठे तो चिलचिलाती धूप थी, सूरज एकदम सिर के ऊपर था। नाव के सीटें भी तपी हुई थी, एक बार लगा कि छोड़ें नौका विहार और चलें छैंया छैंया वापस। पर जैसे ही नाव शुरु हुई तो हवा लगने लगी और पानी के थपेड़ों ने सारी गर्मी दूर कर दी। दोपहर के एक बजे भी , चांदनी रात में नौका विहार का आनंद आया।
जब तक हमारी नाव यात्रा समाप्त हुई, सभी को जोरों सी भूख लग रही थी। रास्ते में कई छोटे ढ़ाबे हैं जो आपको स्थानीय भोजन “झुणका भाकर” (ज्वार की रोटी और बेसन से बना साग) या “भरली वांगी” (भरवां बैंगन) का खाना खिलाते है। उन्हीं में से एक में हम पहुंचे और छक कर सभी ने भोजन का आनंद उठाया।
तब तक दोपहर काफ़ी हो चली थी, कहीं और जाने का विचार त्यागकर गप्पें मारते हुए वापिस पुणे ही लौटने का तय हुआ। लौटते समय हम यही सोच रहे थी कि अगर बाकी लोग पूछेंगे कि क्या देखा? तो कौन-कौन से प्वाइंट का नाम गिनाएं ?

कास – एक फूलों से भरा पठार -ऋषिकेश जोशी
॥श्री॥
कास – एक फूलों से भरा पठार
फूलों की घाटी उतराखंड में स्थित है जो उसके अंग्रेजी नाम ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’ के नाम से विख्यात है। सुदूर उत्तराखंड के चमौली जिले तक जाना सभी को संभव नहीं, पर यहाँ, हमारी मुंबई से पास ही में एक स्थान है जो उसकी झलक दे सकता है।
वह जगह है, महाराष्ट्र के सातारा जिले में स्थित ‘कास पठार’, जो अब काफी जाना-माना है। यहाँ वर्षा ऋतु में तरह-तरह के दुर्लभ जंगली फूल और वनस्पति देखी जा सकती हैं । इसे यूनेस्को ने सन 2012 में विश्व धरोहर स्थल (वर्ल्ड हेरिटेज साईट) का दर्जा दिया, जिसके बाद इसकी ख्याति कई गुना बढ़ गई।
सातारा शहर, मुंबई -बंगलोर राष्ट्रीय राजमार्ग पर मुंबई से 255 किमी दूर, लगभग पाँच घंटे की यात्रा है। कास पठार फूलों का प्रदेश, वहाँ से 25 किमी अंदर पहाड़ों पर है। कई बार सोचा था जाने का पर अब तक योग नहीं बना था। यह फूलों की बहार केवल वर्षा ऋतु में होती है, वह भी बस 6-8 हफ्ते के लिए। इस बार समाचार देखा कि कास पठार 1 सितंबर से 15 अक्तूबर तक पर्यटकों के लिए खुलेगा। हम सोच ही रहे थे कि बंगलोर से दो मित्रों का संदेश आया, उनकी भी इच्छा थी। बस फिर क्या था, बना गया यात्रा का कार्यक्रम।
पर्यटकों की भारी संख्या से फूलों को खतरा होने लगा था। इसलिए वन विभाग द्वारा स्थापित कास समिति, जो इसकी देख रेख करती है, अब प्रतिदिन केवल 3,000 पर्यटकों को ही जाने की अनुमति देती है। उन्हें भी तीन अलग-अलग पारियों में विभाजित कर, हर पारी में केवल 1,000 पर्यटक जा सकते हैं। या हैं; सुबह 7 से 11 , सुबह 11 से दोपहर 3, और दोपहर 3 से 6 तक। पर्यटकों को निराशा ना हो इसलिए ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा है, तो हमने बुक कर लिया 21 सितंबर को सुबह 7 से 11, और फिर एक बार दोपहर में भी। आजकल बारिश का कोई भरोसा नहीं।
20 तारीख की सुबह हम मुंबई से पुणे के लिए निकले, 11 बजे के विमान से बंगलोर के मित्र पुणे आए, उन्हें हवाई अड्डे से लेकर हम निकल पड़े कास के लिए। वैसे तो पुणे या सातारा रहकर भी कास जा सकते हैं, पर हमने सुबह 7 का समय लिया था इसलिए सोचा कास के पास ही जाकर रहा जाए। कास के पास कुछ छोटे-मोटे रिसॉर्ट हैं, उनमें से एक “हेरिटेज वाड़ी” कुछ ठीक लगा, वहीं तीन कमरे बुक कर लिए थे।
पुणे से निकलने के बाद, सुरूर के पास दोपहर का भोजन करने के लिए हम रुके। महाबलेश्वर का रास्ता वहीं से निकलता है, इसलिए कई अच्छे होटल हैं वहाँ। भोजन के बाद दोपहर 4 बजे तक हम सातारा पहुँचे, पूरा शहर पार करके कास का रास्ता पकड़ना था। वैसे तो सातारा तक हम राष्ट्रीय राजमार्ग से आए, पर उस पर कुछ खड्डे अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे, तो हमारी कार के एक पहिये ने दम तोड़ दिया। आगे खतरा मोल लेना ठीक नहीं था तो सातारा में उसे ठीक करा कर आगे बढ़े।
हेरिटेज वाड़ी
सातारा से आगे का रास्ता सुंदर था, चढ़ाई थी पर बहुत कठिन नहीं। चारों ओर हरियाली थी, कहीं जल प्रपात थे। रास्ते में एक जगह दृश्य इतना सुंदर था कि हम लोगों ने कुछ देर रुक कर वहाँ समय बिताया और फ़ोटो भी खींचे। धीरे-धीरे बढ़ती ऊंचाई के साथ बादल भी आने लगे, सफर और खुशनुमा होता गया। आधा घंटे बाद हम खड़े थे ‘हेरिटेज वाड़ी’ के सामने। जगह सुंदर दिख रही थी, एक तरफ कास का पठार था तो दूसरी ओर गहरी घाटी और कन्हेर जलाशय।
चेक-इन में समय नहीं लगा और हम अपने कमरों की ओर बढ़ चले। कमरा देखा, तो पता चला कि रिसॉर्ट वाला हमारी बुकिंग लेने में क्यों संकोच कर रहा था। बार-बार कहा रहा था कि ए.सी. कमरे उपलब्ध नहीं हैं। हमारा कमरा देख हमें मुन्ना भाई एमबीबीएस की याद या गई, जब सर्किट कहता है, “भाई यह कमरा तो शुरू होते ही खतम हो गया”। खैर एक रात की ही बात थी और हमारे कमरों के सामने एक बड़ा बरामदा था जो हमारे ही लिए सुरक्षित था।
कमरा छोड़ दें तो रिसॉर्ट का वातावरण बहुत अच्छा था, तेज हवा और ठंड सी थी। गहरी घाटी और कन्हेर बांध का विस्तृत जलाशय, बहुत सुंदर दृश्य था। उन्होंने वहाँ बैठने के अच्छी व्यवस्था भी की थी, ताकि आप घाटी का आनंद ले सकें और फ़ोटो भी।
हमारी कमरे से निराश देख, उन्होंने हमारे लिए भोजन की विशेष व्यवस्था हमारे बरामदे में कर दी। भोजन स्वादिष्ट था, वैसे उनके मेनू में मटर पनीर, पालक पनीर जैसी राष्ट्रीय डिश थीं, पर हमने स्थानीय व्यंजन लेना पसंद किया, जो अनुभव अच्छा रहा। गप्पों के बीच सोते-सोते रात के 11 बज गए थे, अगली सुबह जल्दी उठना था।
पठार पर
अगली सुबह 6 बजे का अलार्म बजते ही हम सब उठ गए। इस तरह की छोटी जगहों पर सुबह चाय मिलने की तकलीफ होती है, इसलिए साथ में बिजली की केतली और चाय हम ले गए थे। सात बजे हम सब चाय पीकर तैयार थे, कास पठार के लिए। बारिश और ठंड दोनों का इंतजाम साथ लिया था।
पठार पर जगह कम है, इसलिए वाहन नीचे कासणी गांव के पास पार्किंग स्थल पर छोड़ना पड़ता है। वहीं पर आपका टिकट भी चेक होता है। हमने पूछा कि कितनी भीड़ है, उन्होंने बताया कि इस वर्ष पर्यटक कम हैं, हमारी पारी में ऑनलाइन बुकिंग केवल 300 थीं। अतः समय पर आने वालों को भी वे टिकट दे रहे थे। पार्किंग से कास समिति की मिनी बस आपको, ऊपर पठार पर ले जाती है। कोई पाँच सात मिनिट का सफर कर हम, ऊपर पठार पर पहुंच गए।
दो एक जैसे क्षेत्र उन्होंने गेट-1 और 2 में बाँट रखे हैं। बस ने हमें गेट-2 के सामने छोड़ दिया। कुछ बादलों की धुंध थी और सामने चारों ओर हरियाली थी, फूल भी दिख रहे थे। वहाँ पर फिर एक बार टिकट चेक किए गए और हमें गेट से अंदर छोड़ा। पहले जा चुके मित्रों की सलाह पर हमने गाईड लिया। हमारा गाईड, पहले वन विभाग में काम कर चुका था और इस इलाके के उसे अच्छी जानकारी थी। पर गाईड लेना आवश्यक नहीं, अगर आप जनाब शेक्सपीयर के इस डाइलॉग पर विश्वास करते हों कि; “नाम में क्या रखा है? किसी भी नाम से पुकारो गुलाब उतना ही सुंदर रहेगा”।
कास का पठार एक टेबुल टॉप लँड जैसा है, पंचगनी का टेबुल टॉप पठार आप लोगों ने देखा ही होगा, पर यह उससे काफी बड़ा और हर भरा है। कास पठार समुद्र सतह से लगभग 4,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहाँ पर 375 फूलों की जातियाँ हैं , उनमें से 47 दुर्लभ हैं । खास बात यह कि सभी जंगली फूल हैं, अगर आप अप्रैल मई में यहाँ आयें तो कास पर बंजर सी जमीन दिखेगी।
चारों और फूल ही फूल और हरियाली थी, तरह-तरह के फूल। तुलसीदास जी के शब्दों में कहें तो “शोभा बरनी ना जाए”। पूरे क्षेत्र में पथरीला फुटपाथ बनाया हुआ था, ताकि पर्यटक फूल-पौधों पर से ना चलें। अगले डेढ़ घंटे तक हमारा गाईड आगे-आगे और हम उसके पीछे, उन्होंने तरह – तरह के फूल दिखाए उनका महत्व भी समझाया। कुछ फूल सुबह उगते हैं और दोपहर तक मुरझा जाते हैं, कुछ हैं कि दोपहर में ही खिलते हैं। हरे-सफेद रंग के सीडी ऑर्किड फूल तो कास में हर जगह दिखा रहे थे ऊंचे होने के कारण।
कुछ फूलों का विशेष आकार था, जैसे शंखाकार या कंदील पुष्प, तो एक को वर्गमूल (स्क्वेयर रूट) कहते हैं। कुछ फूलों के रंग विशेष थे जैसे एक फूल को मिकी माऊस कहते हैं, उस पर बने लाल और पीले डिजाइन के कारण। कोई छोटा सूर्यमुखी है तो एक नीले रंग के फूल को “सीता जी के आंसू” ऐसा नाम है।
कुछ कीटभक्षी फूल देखे, जिन पर कीड़ा बैठने के बाद वे उसे कैद कर लेते हैं, वहीं कुछ परजीवी पौधे भी देखे जो दूसरे पौधों के ऊपर पनपते हैं। प्रकृति की माया देखने लायक है। कुछ जगह जालों पर ओस के बिन्दु थे, मोतियों जैसे।
बीच-बीच में बादल या जाते थे, जो हमें भिगो जाते हैं। पूरे क्षेत्र में दो तीन जगह बैठ कर सुस्ताने के लिए बनाई हैं, एक जगह से नीचे की घाटी का सुंदर दृश्य भी दिखता है, हमने उसका पूरा फायदा उठाया। हमारे गाईड ने हम सभी लोगों का ग्रुप फ़ोटो लेने में भी मदद की। पूरा भाग पैदल घूम हम दोबारा गेट पर या पहुंचे थे। गेट पर चाय की दुकान और शौचालय की सुविधा थी, कास समिति का आभार मानना होगा इन मूलभूत सुविधाओं के लिए। दूसरी एक खास बात, पूरा परिसर साफ सुथरा था, कहीं कोई कचरा नहीं। समिति के कर्मचारी घूम कर अगर कोई कचरा या प्लास्टिक की पन्नियाँ हों तो उठा रहे थे।
कुमुदिनी तालाब
हमारा अगला पड़ाव था, इसी पठार पर स्थित कुमुदिनी का तालाब, जिसे व्हाइट लिली भी कहते हैं। जाते समय गाईड ने बताया कि कुमुदिनी सुबह खिलती है और दोपहर तक बंद हो जाती है, इसलिए हमारा जाने का समय सही था। यह जगह गेट से 2 किमी की दूरी पर है, पैदल जाने का रास्ता है जिसके दोनों तरफ जाली की बाड़ लगी हुई थी ताकि पर्यटक, फूलों वाले क्षेत्र में अनाधिकृत रूप से ना जाएं।
हालांकि अंतर केवल 2 किमी का था पर हम पिछले डेढ़ घंटे से पैदल घूम रहे थे, काफी लंबा लग रहा था। बीच में ही बादल – बारिश भी आ कर झलक दे गए। हम थके हारे, जब भी वहाँ के कर्मचारियों से पूछते, तो जवाब एक ही था “बस थोड़ा आगे है”। बारिश से याद आया, वहाँ पर 40-40 रुपए में बरसाती उपलब्ध थी, जो हमने खरीदी। यह बरसाती नितांत अनुपयोगी सिद्ध हुई, तेज हवा में प्लास्टिक की पन्नी फट गई, छतरी का ही सहारा लेना पड़ा।
खैर, चलते-चलते हम कुमदिनी तालाब पहुँच गए। वहाँ का दृश्य देख सारी थकान दूर हो गई। पूरा तालाब सफेद लिली के फूलों से भरा था, पानी भी इतना साफ कि तली तक देख लो। बहुत बड़ा तालाब नहीं है पर उन फूलों ने उसे विशेष बना दिया है। वहाँ कुछ देर रुके फ़ोटो खींचे और सुस्ताने के बाद वापसी चले।
वापसी
वापसी की यात्रा उतनी लंबी नहीं लगी, बीच में ही धूप भी आ गई, हमारा स्वागत करने। धूप के कारण अब हम देख पा रहे थे दूर तक और “फूलों की चादर किसे कहते हैं” इसका हमें एहसास हुआ। धूप आने से तितलियाँ भी नजर आने लगा गई थीं। राह में एक गाँव वाले बुजुर्ग ताजी ककड़ी बेच रहे थे, जिसे खाकर हमें कुछ जोश आया।
हमारा चार घंटे का समय पूरा होने आ रहा था और कास पठार की यात्रा भी। गेट से दोबारा बस पकड़ कर पार्किंग और फिर कार से हमारे होटल पहुँचे। सुबह 6 बजे उठने के कारण सभी को खासी भूख लगी थी। कास के फूलों को देख कर मन तृप्त हो गया था, अब गरम-गरम मिसल-पाव और कांदा पोहे खाकर पेट भी तृप्त हो गया। कमरे में जाकर सामान बांधा और तैयारी की अगले पड़ाव की। सामने कास का पठार हमें देख रहा था, मानो पूछ रहा हो;
“अगली बार कब आओगे?”
कास – एक फूलों से भरा पठार
फूलों की घाटी उतराखंड में स्थित है जो उसके अंग्रेजी नाम ‘वैली ऑफ फ्लावर्स’ के नाम से विख्यात है। सुदूर उत्तराखंड के चमौली जिले तक जाना सभी को संभव नहीं, पर यहाँ, हमारी मुंबई से पास ही में एक स्थान है जो उसकी झलक दे सकता है।
वह जगह है, महाराष्ट्र के सातारा जिले में स्थित ‘कास पठार’, जो अब काफी जाना-माना है। यहाँ वर्षा ऋतु में तरह-तरह के दुर्लभ जंगली फूल और वनस्पति देखी जा सकती हैं । इसे यूनेस्को ने सन 2012 में विश्व धरोहर स्थल (वर्ल्ड हेरिटेज साईट) का दर्जा दिया, जिसके बाद इसकी ख्याति कई गुना बढ़ गई।
सातारा शहर, मुंबई -बंगलोर राष्ट्रीय राजमार्ग पर मुंबई से 255 किमी दूर, लगभग पाँच घंटे की यात्रा है। कास पठार फूलों का प्रदेश, वहाँ से 25 किमी अंदर पहाड़ों पर है। कई बार सोचा था जाने का पर अब तक योग नहीं बना था। यह फूलों की बहार केवल वर्षा ऋतु में होती है, वह भी बस 6-8 हफ्ते के लिए। इस बार समाचार देखा कि कास पठार 1 सितंबर से 15 अक्तूबर तक पर्यटकों के लिए खुलेगा। हम सोच ही रहे थे कि बंगलोर से दो मित्रों का संदेश आया, उनकी भी इच्छा थी। बस फिर क्या था, बना गया यात्रा का कार्यक्रम।
पर्यटकों की भारी संख्या से फूलों को खतरा होने लगा था। इसलिए वन विभाग द्वारा स्थापित कास समिति, जो इसकी देख रेख करती है, अब प्रतिदिन केवल 3,000 पर्यटकों को ही जाने की अनुमति देती है। उन्हें भी तीन अलग-अलग पारियों में विभाजित कर, हर पारी में केवल 1,000 पर्यटक जा सकते हैं। या हैं; सुबह 7 से 11 , सुबह 11 से दोपहर 3, और दोपहर 3 से 6 तक। पर्यटकों को निराशा ना हो इसलिए ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा है, तो हमने बुक कर लिया 21 सितंबर को सुबह 7 से 11, और फिर एक बार दोपहर में भी। आजकल बारिश का कोई भरोसा नहीं।
20 तारीख की सुबह हम मुंबई से पुणे के लिए निकले, 11 बजे के विमान से बंगलोर के मित्र पुणे आए, उन्हें हवाई अड्डे से लेकर हम निकल पड़े कास के लिए। वैसे तो पुणे या सातारा रहकर भी कास जा सकते हैं, पर हमने सुबह 7 का समय लिया था इसलिए सोचा कास के पास ही जाकर रहा जाए। कास के पास कुछ छोटे-मोटे रिसॉर्ट हैं, उनमें से एक “हेरिटेज वाड़ी” कुछ ठीक लगा, वहीं तीन कमरे बुक कर लिए थे।
पुणे से निकलने के बाद, सुरूर के पास दोपहर का भोजन करने के लिए हम रुके। महाबलेश्वर का रास्ता वहीं से निकलता है, इसलिए कई अच्छे होटल हैं वहाँ। भोजन के बाद दोपहर 4 बजे तक हम सातारा पहुँचे, पूरा शहर पार करके कास का रास्ता पकड़ना था। वैसे तो सातारा तक हम राष्ट्रीय राजमार्ग से आए, पर उस पर कुछ खड्डे अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे, तो हमारी कार के एक पहिये ने दम तोड़ दिया। आगे खतरा मोल लेना ठीक नहीं था तो सातारा में उसे ठीक करा कर आगे बढ़े।
हेरिटेज वाड़ी
सातारा से आगे का रास्ता सुंदर था, चढ़ाई थी पर बहुत कठिन नहीं। चारों ओर हरियाली थी, कहीं जल प्रपात थे। रास्ते में एक जगह दृश्य इतना सुंदर था कि हम लोगों ने कुछ देर रुक कर वहाँ समय बिताया और फ़ोटो भी खींचे। धीरे-धीरे बढ़ती ऊंचाई के साथ बादल भी आने लगे, सफर और खुशनुमा होता गया। आधा घंटे बाद हम खड़े थे ‘हेरिटेज वाड़ी’ के सामने। जगह सुंदर दिख रही थी, एक तरफ कास का पठार था तो दूसरी ओर गहरी घाटी और कन्हेर जलाशय।
चेक-इन में समय नहीं लगा और हम अपने कमरों की ओर बढ़ चले। कमरा देखा, तो पता चला कि रिसॉर्ट वाला हमारी बुकिंग लेने में क्यों संकोच कर रहा था। बार-बार कहा रहा था कि ए.सी. कमरे उपलब्ध नहीं हैं। हमारा कमरा देख हमें मुन्ना भाई एमबीबीएस की याद या गई, जब सर्किट कहता है, “भाई यह कमरा तो शुरू होते ही खतम हो गया”। खैर एक रात की ही बात थी और हमारे कमरों के सामने एक बड़ा बरामदा था जो हमारे ही लिए सुरक्षित था।
कमरा छोड़ दें तो रिसॉर्ट का वातावरण बहुत अच्छा था, तेज हवा और ठंड सी थी। गहरी घाटी और कन्हेर बांध का विस्तृत जलाशय, बहुत सुंदर दृश्य था। उन्होंने वहाँ बैठने के अच्छी व्यवस्था भी की थी, ताकि आप घाटी का आनंद ले सकें और फ़ोटो भी।
हमारी कमरे से निराश देख, उन्होंने हमारे लिए भोजन की विशेष व्यवस्था हमारे बरामदे में कर दी। भोजन स्वादिष्ट था, वैसे उनके मेनू में मटर पनीर, पालक पनीर जैसी राष्ट्रीय डिश थीं, पर हमने स्थानीय व्यंजन लेना पसंद किया, जो अनुभव अच्छा रहा। गप्पों के बीच सोते-सोते रात के 11 बज गए थे, अगली सुबह जल्दी उठना था।
पठार पर
अगली सुबह 6 बजे का अलार्म बजते ही हम सब उठ गए। इस तरह की छोटी जगहों पर सुबह चाय मिलने की तकलीफ होती है, इसलिए साथ में बिजली की केतली और चाय हम ले गए थे। सात बजे हम सब चाय पीकर तैयार थे, कास पठार के लिए। बारिश और ठंड दोनों का इंतजाम साथ लिया था।
पठार पर जगह कम है, इसलिए वाहन नीचे कासणी गांव के पास पार्किंग स्थल पर छोड़ना पड़ता है। वहीं पर आपका टिकट भी चेक होता है। हमने पूछा कि कितनी भीड़ है, उन्होंने बताया कि इस वर्ष पर्यटक कम हैं, हमारी पारी में ऑनलाइन बुकिंग केवल 300 थीं। अतः समय पर आने वालों को भी वे टिकट दे रहे थे। पार्किंग से कास समिति की मिनी बस आपको, ऊपर पठार पर ले जाती है। कोई पाँच सात मिनिट का सफर कर हम, ऊपर पठार पर पहुंच गए।
दो एक जैसे क्षेत्र उन्होंने गेट-1 और 2 में बाँट रखे हैं। बस ने हमें गेट-2 के सामने छोड़ दिया। कुछ बादलों की धुंध थी और सामने चारों ओर हरियाली थी, फूल भी दिख रहे थे। वहाँ पर फिर एक बार टिकट चेक किए गए और हमें गेट से अंदर छोड़ा। पहले जा चुके मित्रों की सलाह पर हमने गाईड लिया। हमारा गाईड, पहले वन विभाग में काम कर चुका था और इस इलाके के उसे अच्छी जानकारी थी। पर गाईड लेना आवश्यक नहीं, अगर आप जनाब शेक्सपीयर के इस डाइलॉग पर विश्वास करते हों कि; “नाम में क्या रखा है? किसी भी नाम से पुकारो गुलाब उतना ही सुंदर रहेगा”।
कास का पठार एक टेबुल टॉप लँड जैसा है, पंचगनी का टेबुल टॉप पठार आप लोगों ने देखा ही होगा, पर यह उससे काफी बड़ा और हर भरा है। कास पठार समुद्र सतह से लगभग 4,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहाँ पर 375 फूलों की जातियाँ हैं , उनमें से 47 दुर्लभ हैं । खास बात यह कि सभी जंगली फूल हैं, अगर आप अप्रैल मई में यहाँ आयें तो कास पर बंजर सी जमीन दिखेगी।
चारों और फूल ही फूल और हरियाली थी, तरह-तरह के फूल। तुलसीदास जी के शब्दों में कहें तो “शोभा बरनी ना जाए”। पूरे क्षेत्र में पथरीला फुटपाथ बनाया हुआ था, ताकि पर्यटक फूल-पौधों पर से ना चलें। अगले डेढ़ घंटे तक हमारा गाईड आगे-आगे और हम उसके पीछे, उन्होंने तरह – तरह के फूल दिखाए उनका महत्व भी समझाया। कुछ फूल सुबह उगते हैं और दोपहर तक मुरझा जाते हैं, कुछ हैं कि दोपहर में ही खिलते हैं। हरे-सफेद रंग के सीडी ऑर्किड फूल तो कास में हर जगह दिखा रहे थे ऊंचे होने के कारण।
कुछ फूलों का विशेष आकार था, जैसे शंखाकार या कंदील पुष्प, तो एक को वर्गमूल (स्क्वेयर रूट) कहते हैं। कुछ फूलों के रंग विशेष थे जैसे एक फूल को मिकी माऊस कहते हैं, उस पर बने लाल और पीले डिजाइन के कारण। कोई छोटा सूर्यमुखी है तो एक नीले रंग के फूल को “सीता जी के आंसू” ऐसा नाम है।
कुछ कीटभक्षी फूल देखे, जिन पर कीड़ा बैठने के बाद वे उसे कैद कर लेते हैं, वहीं कुछ परजीवी पौधे भी देखे जो दूसरे पौधों के ऊपर पनपते हैं। प्रकृति की माया देखने लायक है। कुछ जगह जालों पर ओस के बिन्दु थे, मोतियों जैसे।
बीच-बीच में बादल या जाते थे, जो हमें भिगो जाते हैं। पूरे क्षेत्र में दो तीन जगह बैठ कर सुस्ताने के लिए बनाई हैं, एक जगह से नीचे की घाटी का सुंदर दृश्य भी दिखता है, हमने उसका पूरा फायदा उठाया। हमारे गाईड ने हम सभी लोगों का ग्रुप फ़ोटो लेने में भी मदद की। पूरा भाग पैदल घूम हम दोबारा गेट पर या पहुंचे थे। गेट पर चाय की दुकान और शौचालय की सुविधा थी, कास समिति का आभार मानना होगा इन मूलभूत सुविधाओं के लिए। दूसरी एक खास बात, पूरा परिसर साफ सुथरा था, कहीं कोई कचरा नहीं। समिति के कर्मचारी घूम कर अगर कोई कचरा या प्लास्टिक की पन्नियाँ हों तो उठा रहे थे।
कुमुदिनी तालाब
हमारा अगला पड़ाव था, इसी पठार पर स्थित कुमुदिनी का तालाब, जिसे व्हाइट लिली भी कहते हैं। जाते समय गाईड ने बताया कि कुमुदिनी सुबह खिलती है और दोपहर तक बंद हो जाती है, इसलिए हमारा जाने का समय सही था। यह जगह गेट से 2 किमी की दूरी पर है, पैदल जाने का रास्ता है जिसके दोनों तरफ जाली की बाड़ लगी हुई थी ताकि पर्यटक, फूलों वाले क्षेत्र में अनाधिकृत रूप से ना जाएं।
हालांकि अंतर केवल 2 किमी का था पर हम पिछले डेढ़ घंटे से पैदल घूम रहे थे, काफी लंबा लग रहा था। बीच में ही बादल – बारिश भी आ कर झलक दे गए। हम थके हारे, जब भी वहाँ के कर्मचारियों से पूछते, तो जवाब एक ही था “बस थोड़ा आगे है”। बारिश से याद आया, वहाँ पर 40-40 रुपए में बरसाती उपलब्ध थी, जो हमने खरीदी। यह बरसाती नितांत अनुपयोगी सिद्ध हुई, तेज हवा में प्लास्टिक की पन्नी फट गई, छतरी का ही सहारा लेना पड़ा।
खैर, चलते-चलते हम कुमदिनी तालाब पहुँच गए। वहाँ का दृश्य देख सारी थकान दूर हो गई। पूरा तालाब सफेद लिली के फूलों से भरा था, पानी भी इतना साफ कि तली तक देख लो। बहुत बड़ा तालाब नहीं है पर उन फूलों ने उसे विशेष बना दिया है। वहाँ कुछ देर रुके फ़ोटो खींचे और सुस्ताने के बाद वापसी चले।
वापसी
वापसी की यात्रा उतनी लंबी नहीं लगी, बीच में ही धूप भी आ गई, हमारा स्वागत करने। धूप के कारण अब हम देख पा रहे थे दूर तक और “फूलों की चादर किसे कहते हैं” इसका हमें एहसास हुआ। धूप आने से तितलियाँ भी नजर आने लगा गई थीं। राह में एक गाँव वाले बुजुर्ग ताजी ककड़ी बेच रहे थे, जिसे खाकर हमें कुछ जोश आया।
हमारा चार घंटे का समय पूरा होने आ रहा था और कास पठार की यात्रा भी। गेट से दोबारा बस पकड़ कर पार्किंग और फिर कार से हमारे होटल पहुँचे। सुबह 6 बजे उठने के कारण सभी को खासी भूख लगी थी। कास के फूलों को देख कर मन तृप्त हो गया था, अब गरम-गरम मिसल-पाव और कांदा पोहे खाकर पेट भी तृप्त हो गया। कमरे में जाकर सामान बांधा और तैयारी की अगले पड़ाव की। सामने कास का पठार हमें देख रहा था, मानो पूछ रहा हो;
“अगली बार कब आओगे?”

हिंदी भाषा से ज्यादा हिन्दुस्तानी होने का एहसास कराती है - संपत सारस्वत
देश को आजाद हुए 75 वर्ष हो चुके हैं और भाषा के ज्ञान में सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से लेकर दैनिक जीवन में क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग भाषाओं का उपयोग घोटाला परंतु सबसे सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था पर भाषा के स्तर पर देखी जाए तो हिंदी ही रही है क्योंकि हिंदी को देखा जाए तो केवल उसी भाषा में संस्कृत की ढाई सौ से ज्यादा व्याकरण की व्यवस्था को शामिल किया गया. परंतु बदलाव के इस दौर में इसे भाषा के षड्यंत्र कहे या राजनीतिक हुकुमरानो की राजनीति लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता देकर कहीं ना कहीं सर्वश्रेष्ठ भाषा हिंदी को कमजोर करने का प्रयास भी किया गया जिसका सीधा सीधा उदाहरण अगर आपको देखना है हिंदी में बात करना हिंदी का पत्र व्यवहार, दैनिक जीवन में लोग किस प्रकार से अपना विरोध प्रदर्शित करवाते हैं
पिछले दिनों में देख रहा था एक आयोजन में मंच संचालक द्वारा ए आर रहमान की उपस्थिति में ए आर रहमान के बारे में हिंदी में परिचय दिया जाता है ए आर रहमान हिंदी को नीचा दिखाने के लिए मंच छोड़ देते हैं मंच संचालक को इस बात का एहसास होता है तब वह तमिल और तेलुगु में बोलना शुरू करती है कहीं ना कहीं हिंदी भाषा को नीचा दिखाने के लिए इस तरह के प्रयास देखने को मिलते हैं केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालय हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए हिंदी राजभाषा विभाग बनाया गया है इसमें कमिटियां बनती है और वह कमिटी केवल और केवल हिंदी का उपयोग किस प्रकार से बेहतरीन किया जा सके इस पर कार्य करती है परंतु इसमें भी कोई ज्यादा असरकारक कार्य नहीं किया जाता कहने को तो हर विभाग हिंदी पखवाड़ा, हिंदी सप्ताह भी मनाती है हिंदी के प्रति कम दिलचस्पी लोगों को पश्चिमी व्यवस्था की तरफ लेकर जा रही है
आज का समय हिंदुस्तान के प्रत्येक नागरिक को इस बात का एहसास दिलाने का समय है हिंदुस्तान की अपनी पहचान हिंदी है और वापस उसी नारे के साथ "हिंदी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा" के साथ लोगों के बीच में जाकर प्रचार और प्रसार के माध्यम से हिंदी भाषा को मजबूत करने की जरूरत है शिक्षा प्रणाली में युवाओं द्वारा अंग्रेजी को प्राथमिकता देने के बाद हिंदी की तरफ उनका रुख काफी उखड़ा रहता है इस स्थिति में हिंदुस्तान के प्रत्येक नागरिक हिंदी के प्रति सहजता और सजगता बरतने की जरूरत है
एक बार मेरा किसी बैंक में जाना हुआ और मैंने देखा कि बैंक में जगह-जगह बोर्ड लगे हुए थे और उस बोर्ड पर लिखा हुआ है कि "अगर आप हिंदी में बात करेंगे तो हमें खुशी होगी" इस तरह के स्लोगन आज की युवा पीढ़ी को हिंदी की ओर आकर्षित करते है हिंदी भाषा को और मजबूत बनाने इस तरह का प्रयास सहायक होता दिखाई दे रहा है
आज का हिंदुस्तान युवाओं का हिंदुस्तान है और उसी स्थिति में युवाओं को हिंदी भाषा के प्रति आकर्षित करना हिंदी को मजबूत बनाने का मुख्य घटक है ऐसे में तमाम संस्थाएं और तमाम विभाग जब हिंदी भाषा पर कार्य कर रहे हैं उनको युवाओं के लिए स्कूल और कॉलेज में हिंदी भाषा को लेकर विशेष रूप से सेमिनार करने चाहिए ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो हिंदी भाषा को लेकर कार्य कर रहे हैं ऐसे लोगों को सार्वजनिक मंच उपलब्ध कराने चाहिए जो अपनी दैनिक भाषा की भाषा में हिंदी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हो क्योंकि हिंदी पर कार्य करने वाले लोगों को सार्वजनिक मंच ना मिलना भी अपने आप में ही हिंदी को कमजोर करना ही है क्योंकि हम देखते हैं कि सार्वजनिक मंचों पर अंग्रेजी, अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाती है हिंदी भाषा पर अपनी पकड़ मजबूत रखने वाला व्यक्ति खुद को लज्जित महसूस करता है ऐसी व्यवस्था से बाहर निकलना होगा हिंदी भाषा बोलने वाले को मजबूत करना होगा तभी हम हिंदी को मजबूत कर पाएंगे और जब हिंदी मजबूत होगी तभी अपना हिंदुस्तान मजबूत होगा ।।
sampatofficials@gmail.com
पिछले दिनों में देख रहा था एक आयोजन में मंच संचालक द्वारा ए आर रहमान की उपस्थिति में ए आर रहमान के बारे में हिंदी में परिचय दिया जाता है ए आर रहमान हिंदी को नीचा दिखाने के लिए मंच छोड़ देते हैं मंच संचालक को इस बात का एहसास होता है तब वह तमिल और तेलुगु में बोलना शुरू करती है कहीं ना कहीं हिंदी भाषा को नीचा दिखाने के लिए इस तरह के प्रयास देखने को मिलते हैं केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालय हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए हिंदी राजभाषा विभाग बनाया गया है इसमें कमिटियां बनती है और वह कमिटी केवल और केवल हिंदी का उपयोग किस प्रकार से बेहतरीन किया जा सके इस पर कार्य करती है परंतु इसमें भी कोई ज्यादा असरकारक कार्य नहीं किया जाता कहने को तो हर विभाग हिंदी पखवाड़ा, हिंदी सप्ताह भी मनाती है हिंदी के प्रति कम दिलचस्पी लोगों को पश्चिमी व्यवस्था की तरफ लेकर जा रही है
आज का समय हिंदुस्तान के प्रत्येक नागरिक को इस बात का एहसास दिलाने का समय है हिंदुस्तान की अपनी पहचान हिंदी है और वापस उसी नारे के साथ "हिंदी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा" के साथ लोगों के बीच में जाकर प्रचार और प्रसार के माध्यम से हिंदी भाषा को मजबूत करने की जरूरत है शिक्षा प्रणाली में युवाओं द्वारा अंग्रेजी को प्राथमिकता देने के बाद हिंदी की तरफ उनका रुख काफी उखड़ा रहता है इस स्थिति में हिंदुस्तान के प्रत्येक नागरिक हिंदी के प्रति सहजता और सजगता बरतने की जरूरत है
एक बार मेरा किसी बैंक में जाना हुआ और मैंने देखा कि बैंक में जगह-जगह बोर्ड लगे हुए थे और उस बोर्ड पर लिखा हुआ है कि "अगर आप हिंदी में बात करेंगे तो हमें खुशी होगी" इस तरह के स्लोगन आज की युवा पीढ़ी को हिंदी की ओर आकर्षित करते है हिंदी भाषा को और मजबूत बनाने इस तरह का प्रयास सहायक होता दिखाई दे रहा है
आज का हिंदुस्तान युवाओं का हिंदुस्तान है और उसी स्थिति में युवाओं को हिंदी भाषा के प्रति आकर्षित करना हिंदी को मजबूत बनाने का मुख्य घटक है ऐसे में तमाम संस्थाएं और तमाम विभाग जब हिंदी भाषा पर कार्य कर रहे हैं उनको युवाओं के लिए स्कूल और कॉलेज में हिंदी भाषा को लेकर विशेष रूप से सेमिनार करने चाहिए ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो हिंदी भाषा को लेकर कार्य कर रहे हैं ऐसे लोगों को सार्वजनिक मंच उपलब्ध कराने चाहिए जो अपनी दैनिक भाषा की भाषा में हिंदी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हो क्योंकि हिंदी पर कार्य करने वाले लोगों को सार्वजनिक मंच ना मिलना भी अपने आप में ही हिंदी को कमजोर करना ही है क्योंकि हम देखते हैं कि सार्वजनिक मंचों पर अंग्रेजी, अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाती है हिंदी भाषा पर अपनी पकड़ मजबूत रखने वाला व्यक्ति खुद को लज्जित महसूस करता है ऐसी व्यवस्था से बाहर निकलना होगा हिंदी भाषा बोलने वाले को मजबूत करना होगा तभी हम हिंदी को मजबूत कर पाएंगे और जब हिंदी मजबूत होगी तभी अपना हिंदुस्तान मजबूत होगा ।।
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खेला प्ले स्टोर का
-ऋषिकेश जोशी
कल की बात है, मैं अपने कमरे में काम कर रहा था तो हमारे घर काम करने वाली बाई ने सकुचाते हुए पूछा , “सर थोड़ा समय दे सकेंगे”? मैंने कारण पूछा, उसने बताया कि उसने हाल ही में बैंक से पास बुक अपडेट करवाई है, और उसके खाते से कई बार पैसा कहीं ओर ट्रांसफर हुआ है। वह काफी चिंतित थी ,उसे इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं था, बैंक वालों ने भी कोई मदद करने में असमर्थता दिखाई।
मैंने पास बुक पलट कर देखी, उसमें कई सारे ‘यूपीआई’ डेबिट थे। सभी किसी ‘यूरोनेट’ के नाम से थे, रकम 80 से लेकर 1,000 रुपए तक की थी। बाई ने बताया कि कुछ हफ्ते पहले उसने मोबाईल पर ‘गूगल पे’ चालू किया था, उसके बाद से ही कुछ हो रहा है। पहली नजर में यह मुझे किसी ऑन लाईन फ्रॉड जैसा लगा, तुरंत गूगल को संपर्क करने का प्रयत्न किया। उनसे चैट पर बात हो सकी, गूगल वालों ने कहा कि जिस मोबाईल पर गूगल पे है उसी फोन से शिकायत दर्ज करनी होगी, साथ ही जिस भुगतान पर शक है उसका स्क्रीन शॉट भी भेजना होगा। हाँ , पर उसने इतना बताया कि ‘यूरोनेट’ के नाम से भुगतान , अक्सर किसी रिचार्ज के लिए आता है।
मैंने बाई से फोन मांगा, तो वह रूआँसी हो गई, उसने बताया कि वह फोन तो उसके किशोर बेटे के पास है जो आठवीं में पढ़ता है। ऑन लाईन क्लास होने के कारण बाई ने स्मार्ट फोन बेटे के पास दे दिया था और वह साधा फोन रखे हुए थी। ऐसे में खाते से और भी रकम निकलने का खतरा देख, मैंने उसे पहले एटीएम से अधिकतम पैसा निकालने को कहा। दूसरा शनिवार होने के कारण दो दिन बैंक की छुट्टी थी, बैंक जाना संभव नहीं था। उसके बाद तुरंत वह फोन लाने को कहा, जिस पर गूगल पे था।
वह एटीएम से दैनिक सीमा के अनुसार ही पैसा निकाल पाई, मतलब खतरा अब भी था। थोड़ी देर में बाई घर से वह दूसरा फोन लेकर आ गई। पास बुक देखने के बाद, डर से उन्होंने फोन में गूगल पे निकाला हुआ था। उसे दोबारा चालू किया, सब देखा पर कुछ गड़बड़ दिखा नहीं। एकदम साफ स्लेट, अब प्रश्न था क्या करें? गूगल पर शिकायत दर्ज करने के लिए पुराने भुगतान का स्क्रीन शॉट चाहिए था, वह हमें नहीं मिला ना ही बैंक का कोई एस.एम. एस.।
फिर शांति से उस फोन के सारे एप्प देखना शुरू किया। जब उसका ई-मेल खोला, तो उसमें से पूरा कच्चा चिट्ठा बाहर आया, जिसे देख मैं हिल गया। उस किशोर बालक को ऑन लाईन गेम्स का चस्का लग गया था। अलग खेलों के लिए उसने तरह तरह के ‘पैक्स’ लिए थे, उसे तरह यूट्यूब पर कुछ “पैड” चैनल का भी भुगतान था।
उसने गूगल प्ले स्टोर से बार-बार रिचार्ज कूपन खरीद कर, उन्हें पैक्स के लिए इस्तेमाल (‘रीडीम’) किया था। एक-एक कर सारे ई-मेल देख कर, रकम को बैंक पास बुक से मिलाना शुरू किया। तीन हफ्ते मैं उस बालक ने 31 बार रिचार्ज खरीद कर लगभग 20,000 रुपए फूँक डाले थे। उस घर - घर काम करने वाली माँ के लिए यह दो माह की कमाई थी, उस पर क्या बीती होगी, भगवान ही जानता है।
यह हुआ कैसे? उस फोन पर गूगल पे शुरू करने पर, उस बच्चे ने गूगल प्ले स्टोर को – गूगल पे से लिंक कर दिया था। जब भी वह प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीदता, सीधे बैंक से पैसा चला जाता था। अब यह उसके अकेले के दिमाग की उपज ना भी हो, इस तरह की ‘सलाह’ देने वाले मित्र आस-पास रहते ही हैं। बच्चा अकेला नहीं खेलता था उसके साथी भी थे , वह शायद उन साथियों में हीरो होगा क्योंकि पैसा वह खर्च कर रहा था। अब देखें तो माँ ने बेटे को ऑन लाईन क्लास में पढ़ने के लिए स्मार्ट फोन दे कर अच्छा काम किया पर, पर उसी फोन नंबर से उसका बैंक खाता जुड़ा हुआ था जो खतरनाक सिद्ध हुआ। ऐसा नेहीम कि बाई अनपढ़ थी , वह 8 वीं तक पढ़ी थी पर इतनी जानकारी तो उसे भी नहीं थी।
अब प्रश्न उठता है कि क्या दोष माँ का है? या दोष उसे किशोर बेटे का है ? (बाप साथ नहीं रहता, वह दूसरे शहर में है)। इस बात पर कई मत हो सकते हैं , पर गया हुआ पैसा लौट के तो आने से रहा।
मुझे लगता है कि क्या इस तरह के ऑनलाईन गेम्स बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है? ये खेल इस तरह बनाए जाते है कि बच्चों को उनकी लत लग जाए और घंटों उसमें लगे रहम। हर खेल में अगला लेवल, नया अस्त्र -शस्त्र, नई कार ... हर चीज के लिए एक पैक खरीदना है । जैसे एक मासूम से दिखने वाले खेल में आपको भेड़ को चारा खिलाना है, पर चारे के लिए एक पैक खरीदना होगा । उसी तरह किसी युद्ध वाले खेल में नई पोशाख या नए अस्त्र खरीदने को पैक चाहिए । कार रेसिंग खेल रहे हैं तो नई शक्तिशाली कार के लिए पैक चाहिए। इस तरह के पैक की कीमत 10 रुपए से लेकर हजारों तक जाती है । इन्हें “इन-एप्प पर्चेस" कहते हैं।
इन पैक का भुगतान होता है , प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीद कर। अगर एंड्रॉइड फोन है तो प्ले-स्टोर और अगर आई-फोन है तो ‘एप-स्टोर’ , काम एक जैसा है । तो खेल बनाने वालों की ही तरह से क्या इन मोबाइल सिस्टम बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं ?
नैतिक जिम्मेदारी की बात इसलिए कहा रहा हूँ, क्यों कि अगर आप कानूनी रास्ता खोजना चाहेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। ये सभी बहुराष्ट्रीय उद्योग उनकी लंबी -लंबी कानूनी शर्तों का हवाला देंगी, जिसमें हम जाने -अनजाने में “आई एग्री’ पर टिक कर सहमति दे देते हैं ।
ऑनलाइन तकनीक तो अब लंबे समय रहने वाली है तो बच्चों को मोबाईल नहीं देंगे, ऐसा नहीं कह सकते। समय की आवश्यकता है। इस घटना से यह सबक अवश्य सीखा कि हम सभी को इस ऑन लाईन के युग में कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
1) जब पालक अपने बच्चों को मोबाईल दें, तो यह निश्चित करें कि वह मोबाईल नंबर आपके बैंक खाता, आधार या अन्य किसी महत्वपूर्ण जगह से लिंक तो नहीं है ।
2) “हमारा बच्चा सब जानता है “ इस बात का माँ -बाप अभिमान करें, पर उनके हाथ में आपके बैंक व्यवहार ना दें।
3) बच्चे मोबाईल पर क्या कर रहे हैं, क्या खेल रहे है, कहीं उन्हें खेल की लत तो नहीं लगी? इस बात की ओर पालक ध्यान रखें। यदि आवश्यक हो तो किसी आस पास के जानकार मित्र की मदद लें।
ऋषिकेश खेला प्ले स्टोर का
कल की बात है, मैं अपने कमरे में काम कर रहा था तो हमारे घर काम करने वाली बाई ने सकुचाते हुए पूछा , “सर थोड़ा समय दे सकेंगे”? मैंने कारण पूछा, उसने बताया कि उसने हाल ही में बैंक से पास बुक अपडेट करवाई है, और उसके खाते से कई बार पैसा कहीं ओर ट्रांसफर हुआ है। वह काफी चिंतित थी ,उसे इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं था, बैंक वालों ने भी कोई मदद करने में असमर्थता दिखाई।
मैंने पास बुक पलट कर देखी, उसमें कई सारे ‘यूपीआई’ डेबिट थे। सभी किसी ‘यूरोनेट’ के नाम से थे, रकम 80 से लेकर 1,000 रुपए तक की थी। बाई ने बताया कि कुछ हफ्ते पहले उसने मोबाईल पर ‘गूगल पे’ चालू किया था, उसके बाद से ही कुछ हो रहा है। पहली नजर में यह मुझे किसी ऑन लाईन फ्रॉड जैसा लगा, तुरंत गूगल को संपर्क करने का प्रयत्न किया। उनसे चैट पर बात हो सकी, गूगल वालों ने कहा कि जिस मोबाईल पर गूगल पे है उसी फोन से शिकायत दर्ज करनी होगी, साथ ही जिस भुगतान पर शक है उसका स्क्रीन शॉट भी भेजना होगा। हाँ , पर उसने इतना बताया कि ‘यूरोनेट’ के नाम से भुगतान , अक्सर किसी रिचार्ज के लिए आता है।
मैंने बाई से फोन मांगा, तो वह रूआँसी हो गई, उसने बताया कि वह फोन तो उसके किशोर बेटे के पास है जो आठवीं में पढ़ता है। ऑन लाईन क्लास होने के कारण बाई ने स्मार्ट फोन बेटे के पास दे दिया था और वह साधा फोन रखे हुए थी। ऐसे में खाते से और भी रकम निकलने का खतरा देख, मैंने उसे पहले एटीएम से अधिकतम पैसा निकालने को कहा। दूसरा शनिवार होने के कारण दो दिन बैंक की छुट्टी थी, बैंक जाना संभव नहीं था। उसके बाद तुरंत वह फोन लाने को कहा, जिस पर गूगल पे था।
वह एटीएम से दैनिक सीमा के अनुसार ही पैसा निकाल पाई, मतलब खतरा अब भी था। थोड़ी देर में बाई घर से वह दूसरा फोन लेकर आ गई। पास बुक देखने के बाद, डर से उन्होंने फोन में गूगल पे निकाला हुआ था। उसे दोबारा चालू किया, सब देखा पर कुछ गड़बड़ दिखा नहीं। एकदम साफ स्लेट, अब प्रश्न था क्या करें? गूगल पर शिकायत दर्ज करने के लिए पुराने भुगतान का स्क्रीन शॉट चाहिए था, वह हमें नहीं मिला ना ही बैंक का कोई एस.एम. एस.।
फिर शांति से उस फोन के सारे एप्प देखना शुरू किया। जब उसका ई-मेल खोला, तो उसमें से पूरा कच्चा चिट्ठा बाहर आया, जिसे देख मैं हिल गया। उस किशोर बालक को ऑन लाईन गेम्स का चस्का लग गया था। अलग खेलों के लिए उसने तरह तरह के ‘पैक्स’ लिए थे, उसे तरह यूट्यूब पर कुछ “पैड” चैनल का भी भुगतान था।
उसने गूगल प्ले स्टोर से बार-बार रिचार्ज कूपन खरीद कर, उन्हें पैक्स के लिए इस्तेमाल (‘रीडीम’) किया था। एक-एक कर सारे ई-मेल देख कर, रकम को बैंक पास बुक से मिलाना शुरू किया। तीन हफ्ते मैं उस बालक ने 31 बार रिचार्ज खरीद कर लगभग 20,000 रुपए फूँक डाले थे। उस घर - घर काम करने वाली माँ के लिए यह दो माह की कमाई थी, उस पर क्या बीती होगी, भगवान ही जानता है।
यह हुआ कैसे? उस फोन पर गूगल पे शुरू करने पर, उस बच्चे ने गूगल प्ले स्टोर को – गूगल पे से लिंक कर दिया था। जब भी वह प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीदता, सीधे बैंक से पैसा चला जाता था। अब यह उसके अकेले के दिमाग की उपज ना भी हो, इस तरह की ‘सलाह’ देने वाले मित्र आस-पास रहते ही हैं। बच्चा अकेला नहीं खेलता था उसके साथी भी थे , वह शायद उन साथियों में हीरो होगा क्योंकि पैसा वह खर्च कर रहा था। अब देखें तो माँ ने बेटे को ऑन लाईन क्लास में पढ़ने के लिए स्मार्ट फोन दे कर अच्छा काम किया पर, पर उसी फोन नंबर से उसका बैंक खाता जुड़ा हुआ था जो खतरनाक सिद्ध हुआ। ऐसा नेहीम कि बाई अनपढ़ थी , वह 8 वीं तक पढ़ी थी पर इतनी जानकारी तो उसे भी नहीं थी।
अब प्रश्न उठता है कि क्या दोष माँ का है? या दोष उसे किशोर बेटे का है ? (बाप साथ नहीं रहता, वह दूसरे शहर में है)। इस बात पर कई मत हो सकते हैं , पर गया हुआ पैसा लौट के तो आने से रहा।
मुझे लगता है कि क्या इस तरह के ऑनलाईन गेम्स बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है? ये खेल इस तरह बनाए जाते है कि बच्चों को उनकी लत लग जाए और घंटों उसमें लगे रहम। हर खेल में अगला लेवल, नया अस्त्र -शस्त्र, नई कार ... हर चीज के लिए एक पैक खरीदना है । जैसे एक मासूम से दिखने वाले खेल में आपको भेड़ को चारा खिलाना है, पर चारे के लिए एक पैक खरीदना होगा । उसी तरह किसी युद्ध वाले खेल में नई पोशाख या नए अस्त्र खरीदने को पैक चाहिए । कार रेसिंग खेल रहे हैं तो नई शक्तिशाली कार के लिए पैक चाहिए। इस तरह के पैक की कीमत 10 रुपए से लेकर हजारों तक जाती है । इन्हें “इन-एप्प पर्चेस" कहते हैं।
इन पैक का भुगतान होता है , प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीद कर। अगर एंड्रॉइड फोन है तो प्ले-स्टोर और अगर आई-फोन है तो ‘एप-स्टोर’ , काम एक जैसा है । तो खेल बनाने वालों की ही तरह से क्या इन मोबाइल सिस्टम बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं ?
नैतिक जिम्मेदारी की बात इसलिए कहा रहा हूँ, क्यों कि अगर आप कानूनी रास्ता खोजना चाहेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। ये सभी बहुराष्ट्रीय उद्योग उनकी लंबी -लंबी कानूनी शर्तों का हवाला देंगी, जिसमें हम जाने -अनजाने में “आई एग्री’ पर टिक कर सहमति दे देते हैं ।
ऑनलाइन तकनीक तो अब लंबे समय रहने वाली है तो बच्चों को मोबाईल नहीं देंगे, ऐसा नहीं कह सकते। समय की आवश्यकता है। इस घटना से यह सबक अवश्य सीखा कि हम सभी को इस ऑन लाईन के युग में कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
1) जब पालक अपने बच्चों को मोबाईल दें, तो यह निश्चित करें कि वह मोबाईल नंबर आपके बैंक खाता, आधार या अन्य किसी महत्वपूर्ण जगह से लिंक तो नहीं है ।
2) “हमारा बच्चा सब जानता है “ इस बात का माँ -बाप अभिमान करें, पर उनके हाथ में आपके बैंक व्यवहार ना दें।
3) बच्चे मोबाईल पर क्या कर रहे हैं, क्या खेल रहे है, कहीं उन्हें खेल की लत तो नहीं लगी? इस बात की ओर पालक ध्यान रखें। यदि आवश्यक हो तो किसी आस पास के जानकार मित्र की मदद लें।
ऋषिकेश
मैंने पास बुक पलट कर देखी, उसमें कई सारे ‘यूपीआई’ डेबिट थे। सभी किसी ‘यूरोनेट’ के नाम से थे, रकम 80 से लेकर 1,000 रुपए तक की थी। बाई ने बताया कि कुछ हफ्ते पहले उसने मोबाईल पर ‘गूगल पे’ चालू किया था, उसके बाद से ही कुछ हो रहा है। पहली नजर में यह मुझे किसी ऑन लाईन फ्रॉड जैसा लगा, तुरंत गूगल को संपर्क करने का प्रयत्न किया। उनसे चैट पर बात हो सकी, गूगल वालों ने कहा कि जिस मोबाईल पर गूगल पे है उसी फोन से शिकायत दर्ज करनी होगी, साथ ही जिस भुगतान पर शक है उसका स्क्रीन शॉट भी भेजना होगा। हाँ , पर उसने इतना बताया कि ‘यूरोनेट’ के नाम से भुगतान , अक्सर किसी रिचार्ज के लिए आता है।
मैंने बाई से फोन मांगा, तो वह रूआँसी हो गई, उसने बताया कि वह फोन तो उसके किशोर बेटे के पास है जो आठवीं में पढ़ता है। ऑन लाईन क्लास होने के कारण बाई ने स्मार्ट फोन बेटे के पास दे दिया था और वह साधा फोन रखे हुए थी। ऐसे में खाते से और भी रकम निकलने का खतरा देख, मैंने उसे पहले एटीएम से अधिकतम पैसा निकालने को कहा। दूसरा शनिवार होने के कारण दो दिन बैंक की छुट्टी थी, बैंक जाना संभव नहीं था। उसके बाद तुरंत वह फोन लाने को कहा, जिस पर गूगल पे था।
वह एटीएम से दैनिक सीमा के अनुसार ही पैसा निकाल पाई, मतलब खतरा अब भी था। थोड़ी देर में बाई घर से वह दूसरा फोन लेकर आ गई। पास बुक देखने के बाद, डर से उन्होंने फोन में गूगल पे निकाला हुआ था। उसे दोबारा चालू किया, सब देखा पर कुछ गड़बड़ दिखा नहीं। एकदम साफ स्लेट, अब प्रश्न था क्या करें? गूगल पर शिकायत दर्ज करने के लिए पुराने भुगतान का स्क्रीन शॉट चाहिए था, वह हमें नहीं मिला ना ही बैंक का कोई एस.एम. एस.।
फिर शांति से उस फोन के सारे एप्प देखना शुरू किया। जब उसका ई-मेल खोला, तो उसमें से पूरा कच्चा चिट्ठा बाहर आया, जिसे देख मैं हिल गया। उस किशोर बालक को ऑन लाईन गेम्स का चस्का लग गया था। अलग खेलों के लिए उसने तरह तरह के ‘पैक्स’ लिए थे, उसे तरह यूट्यूब पर कुछ “पैड” चैनल का भी भुगतान था।
उसने गूगल प्ले स्टोर से बार-बार रिचार्ज कूपन खरीद कर, उन्हें पैक्स के लिए इस्तेमाल (‘रीडीम’) किया था। एक-एक कर सारे ई-मेल देख कर, रकम को बैंक पास बुक से मिलाना शुरू किया। तीन हफ्ते मैं उस बालक ने 31 बार रिचार्ज खरीद कर लगभग 20,000 रुपए फूँक डाले थे। उस घर - घर काम करने वाली माँ के लिए यह दो माह की कमाई थी, उस पर क्या बीती होगी, भगवान ही जानता है।
यह हुआ कैसे? उस फोन पर गूगल पे शुरू करने पर, उस बच्चे ने गूगल प्ले स्टोर को – गूगल पे से लिंक कर दिया था। जब भी वह प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीदता, सीधे बैंक से पैसा चला जाता था। अब यह उसके अकेले के दिमाग की उपज ना भी हो, इस तरह की ‘सलाह’ देने वाले मित्र आस-पास रहते ही हैं। बच्चा अकेला नहीं खेलता था उसके साथी भी थे , वह शायद उन साथियों में हीरो होगा क्योंकि पैसा वह खर्च कर रहा था। अब देखें तो माँ ने बेटे को ऑन लाईन क्लास में पढ़ने के लिए स्मार्ट फोन दे कर अच्छा काम किया पर, पर उसी फोन नंबर से उसका बैंक खाता जुड़ा हुआ था जो खतरनाक सिद्ध हुआ। ऐसा नेहीम कि बाई अनपढ़ थी , वह 8 वीं तक पढ़ी थी पर इतनी जानकारी तो उसे भी नहीं थी।
अब प्रश्न उठता है कि क्या दोष माँ का है? या दोष उसे किशोर बेटे का है ? (बाप साथ नहीं रहता, वह दूसरे शहर में है)। इस बात पर कई मत हो सकते हैं , पर गया हुआ पैसा लौट के तो आने से रहा।
मुझे लगता है कि क्या इस तरह के ऑनलाईन गेम्स बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है? ये खेल इस तरह बनाए जाते है कि बच्चों को उनकी लत लग जाए और घंटों उसमें लगे रहम। हर खेल में अगला लेवल, नया अस्त्र -शस्त्र, नई कार ... हर चीज के लिए एक पैक खरीदना है । जैसे एक मासूम से दिखने वाले खेल में आपको भेड़ को चारा खिलाना है, पर चारे के लिए एक पैक खरीदना होगा । उसी तरह किसी युद्ध वाले खेल में नई पोशाख या नए अस्त्र खरीदने को पैक चाहिए । कार रेसिंग खेल रहे हैं तो नई शक्तिशाली कार के लिए पैक चाहिए। इस तरह के पैक की कीमत 10 रुपए से लेकर हजारों तक जाती है । इन्हें “इन-एप्प पर्चेस" कहते हैं।
इन पैक का भुगतान होता है , प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीद कर। अगर एंड्रॉइड फोन है तो प्ले-स्टोर और अगर आई-फोन है तो ‘एप-स्टोर’ , काम एक जैसा है । तो खेल बनाने वालों की ही तरह से क्या इन मोबाइल सिस्टम बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं ?
नैतिक जिम्मेदारी की बात इसलिए कहा रहा हूँ, क्यों कि अगर आप कानूनी रास्ता खोजना चाहेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। ये सभी बहुराष्ट्रीय उद्योग उनकी लंबी -लंबी कानूनी शर्तों का हवाला देंगी, जिसमें हम जाने -अनजाने में “आई एग्री’ पर टिक कर सहमति दे देते हैं ।
ऑनलाइन तकनीक तो अब लंबे समय रहने वाली है तो बच्चों को मोबाईल नहीं देंगे, ऐसा नहीं कह सकते। समय की आवश्यकता है। इस घटना से यह सबक अवश्य सीखा कि हम सभी को इस ऑन लाईन के युग में कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
1) जब पालक अपने बच्चों को मोबाईल दें, तो यह निश्चित करें कि वह मोबाईल नंबर आपके बैंक खाता, आधार या अन्य किसी महत्वपूर्ण जगह से लिंक तो नहीं है ।
2) “हमारा बच्चा सब जानता है “ इस बात का माँ -बाप अभिमान करें, पर उनके हाथ में आपके बैंक व्यवहार ना दें।
3) बच्चे मोबाईल पर क्या कर रहे हैं, क्या खेल रहे है, कहीं उन्हें खेल की लत तो नहीं लगी? इस बात की ओर पालक ध्यान रखें। यदि आवश्यक हो तो किसी आस पास के जानकार मित्र की मदद लें।
ऋषिकेश खेला प्ले स्टोर का
कल की बात है, मैं अपने कमरे में काम कर रहा था तो हमारे घर काम करने वाली बाई ने सकुचाते हुए पूछा , “सर थोड़ा समय दे सकेंगे”? मैंने कारण पूछा, उसने बताया कि उसने हाल ही में बैंक से पास बुक अपडेट करवाई है, और उसके खाते से कई बार पैसा कहीं ओर ट्रांसफर हुआ है। वह काफी चिंतित थी ,उसे इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं था, बैंक वालों ने भी कोई मदद करने में असमर्थता दिखाई।
मैंने पास बुक पलट कर देखी, उसमें कई सारे ‘यूपीआई’ डेबिट थे। सभी किसी ‘यूरोनेट’ के नाम से थे, रकम 80 से लेकर 1,000 रुपए तक की थी। बाई ने बताया कि कुछ हफ्ते पहले उसने मोबाईल पर ‘गूगल पे’ चालू किया था, उसके बाद से ही कुछ हो रहा है। पहली नजर में यह मुझे किसी ऑन लाईन फ्रॉड जैसा लगा, तुरंत गूगल को संपर्क करने का प्रयत्न किया। उनसे चैट पर बात हो सकी, गूगल वालों ने कहा कि जिस मोबाईल पर गूगल पे है उसी फोन से शिकायत दर्ज करनी होगी, साथ ही जिस भुगतान पर शक है उसका स्क्रीन शॉट भी भेजना होगा। हाँ , पर उसने इतना बताया कि ‘यूरोनेट’ के नाम से भुगतान , अक्सर किसी रिचार्ज के लिए आता है।
मैंने बाई से फोन मांगा, तो वह रूआँसी हो गई, उसने बताया कि वह फोन तो उसके किशोर बेटे के पास है जो आठवीं में पढ़ता है। ऑन लाईन क्लास होने के कारण बाई ने स्मार्ट फोन बेटे के पास दे दिया था और वह साधा फोन रखे हुए थी। ऐसे में खाते से और भी रकम निकलने का खतरा देख, मैंने उसे पहले एटीएम से अधिकतम पैसा निकालने को कहा। दूसरा शनिवार होने के कारण दो दिन बैंक की छुट्टी थी, बैंक जाना संभव नहीं था। उसके बाद तुरंत वह फोन लाने को कहा, जिस पर गूगल पे था।
वह एटीएम से दैनिक सीमा के अनुसार ही पैसा निकाल पाई, मतलब खतरा अब भी था। थोड़ी देर में बाई घर से वह दूसरा फोन लेकर आ गई। पास बुक देखने के बाद, डर से उन्होंने फोन में गूगल पे निकाला हुआ था। उसे दोबारा चालू किया, सब देखा पर कुछ गड़बड़ दिखा नहीं। एकदम साफ स्लेट, अब प्रश्न था क्या करें? गूगल पर शिकायत दर्ज करने के लिए पुराने भुगतान का स्क्रीन शॉट चाहिए था, वह हमें नहीं मिला ना ही बैंक का कोई एस.एम. एस.।
फिर शांति से उस फोन के सारे एप्प देखना शुरू किया। जब उसका ई-मेल खोला, तो उसमें से पूरा कच्चा चिट्ठा बाहर आया, जिसे देख मैं हिल गया। उस किशोर बालक को ऑन लाईन गेम्स का चस्का लग गया था। अलग खेलों के लिए उसने तरह तरह के ‘पैक्स’ लिए थे, उसे तरह यूट्यूब पर कुछ “पैड” चैनल का भी भुगतान था।
उसने गूगल प्ले स्टोर से बार-बार रिचार्ज कूपन खरीद कर, उन्हें पैक्स के लिए इस्तेमाल (‘रीडीम’) किया था। एक-एक कर सारे ई-मेल देख कर, रकम को बैंक पास बुक से मिलाना शुरू किया। तीन हफ्ते मैं उस बालक ने 31 बार रिचार्ज खरीद कर लगभग 20,000 रुपए फूँक डाले थे। उस घर - घर काम करने वाली माँ के लिए यह दो माह की कमाई थी, उस पर क्या बीती होगी, भगवान ही जानता है।
यह हुआ कैसे? उस फोन पर गूगल पे शुरू करने पर, उस बच्चे ने गूगल प्ले स्टोर को – गूगल पे से लिंक कर दिया था। जब भी वह प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीदता, सीधे बैंक से पैसा चला जाता था। अब यह उसके अकेले के दिमाग की उपज ना भी हो, इस तरह की ‘सलाह’ देने वाले मित्र आस-पास रहते ही हैं। बच्चा अकेला नहीं खेलता था उसके साथी भी थे , वह शायद उन साथियों में हीरो होगा क्योंकि पैसा वह खर्च कर रहा था। अब देखें तो माँ ने बेटे को ऑन लाईन क्लास में पढ़ने के लिए स्मार्ट फोन दे कर अच्छा काम किया पर, पर उसी फोन नंबर से उसका बैंक खाता जुड़ा हुआ था जो खतरनाक सिद्ध हुआ। ऐसा नेहीम कि बाई अनपढ़ थी , वह 8 वीं तक पढ़ी थी पर इतनी जानकारी तो उसे भी नहीं थी।
अब प्रश्न उठता है कि क्या दोष माँ का है? या दोष उसे किशोर बेटे का है ? (बाप साथ नहीं रहता, वह दूसरे शहर में है)। इस बात पर कई मत हो सकते हैं , पर गया हुआ पैसा लौट के तो आने से रहा।
मुझे लगता है कि क्या इस तरह के ऑनलाईन गेम्स बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है? ये खेल इस तरह बनाए जाते है कि बच्चों को उनकी लत लग जाए और घंटों उसमें लगे रहम। हर खेल में अगला लेवल, नया अस्त्र -शस्त्र, नई कार ... हर चीज के लिए एक पैक खरीदना है । जैसे एक मासूम से दिखने वाले खेल में आपको भेड़ को चारा खिलाना है, पर चारे के लिए एक पैक खरीदना होगा । उसी तरह किसी युद्ध वाले खेल में नई पोशाख या नए अस्त्र खरीदने को पैक चाहिए । कार रेसिंग खेल रहे हैं तो नई शक्तिशाली कार के लिए पैक चाहिए। इस तरह के पैक की कीमत 10 रुपए से लेकर हजारों तक जाती है । इन्हें “इन-एप्प पर्चेस" कहते हैं।
इन पैक का भुगतान होता है , प्ले स्टोर से रिचार्ज कूपन खरीद कर। अगर एंड्रॉइड फोन है तो प्ले-स्टोर और अगर आई-फोन है तो ‘एप-स्टोर’ , काम एक जैसा है । तो खेल बनाने वालों की ही तरह से क्या इन मोबाइल सिस्टम बनाने वालों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं ?
नैतिक जिम्मेदारी की बात इसलिए कहा रहा हूँ, क्यों कि अगर आप कानूनी रास्ता खोजना चाहेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। ये सभी बहुराष्ट्रीय उद्योग उनकी लंबी -लंबी कानूनी शर्तों का हवाला देंगी, जिसमें हम जाने -अनजाने में “आई एग्री’ पर टिक कर सहमति दे देते हैं ।
ऑनलाइन तकनीक तो अब लंबे समय रहने वाली है तो बच्चों को मोबाईल नहीं देंगे, ऐसा नहीं कह सकते। समय की आवश्यकता है। इस घटना से यह सबक अवश्य सीखा कि हम सभी को इस ऑन लाईन के युग में कुछ सावधानियाँ बरतनी चाहिए:
1) जब पालक अपने बच्चों को मोबाईल दें, तो यह निश्चित करें कि वह मोबाईल नंबर आपके बैंक खाता, आधार या अन्य किसी महत्वपूर्ण जगह से लिंक तो नहीं है ।
2) “हमारा बच्चा सब जानता है “ इस बात का माँ -बाप अभिमान करें, पर उनके हाथ में आपके बैंक व्यवहार ना दें।
3) बच्चे मोबाईल पर क्या कर रहे हैं, क्या खेल रहे है, कहीं उन्हें खेल की लत तो नहीं लगी? इस बात की ओर पालक ध्यान रखें। यदि आवश्यक हो तो किसी आस पास के जानकार मित्र की मदद लें।
ऋषिकेश
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