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संदूक - काली मौर्य

संदूक


सत्तर साल के निरहू के पास एक पुश्तैनी संदूक था। पुराने पीतल का सोने जैसा कुंडा था उसका । असली अलीगढ़ी ताला जड़ा रहता था संदूक पर। ताले की चाभी हमेशा, चाहे कोई भी मौका- बेमौका हो लेकिन उस संदूक की चाभी निरहू की अंटी से अलग नहीं हो सकती थी।

निरहू के दो शादीशुदा बेटे थे और दो ही शादीशुदा बेटियां थीं, जिनकी नज़रें निरहू के पुश्तैनी संदूक पर लगी ही रहती थीं। संदूक में रखे मालख़जाने के ख्वाब देखती दोनों बहुएं निरहू को जी जान से प्रेम करने का नाटक करती रहती थीं। मजाल क्या कि कभी उन्हें इस प्रपंच से बोरियत हुई हो ! बहुओं से सम्मोहित दोनों बेटे भी संदूक के ख़ज़ाने का सुराग़ पाने के चक्कर में अब तक निरहू को खूब माल-पुआ खिला चुके थे। निरहू की दोनों बेटियां भी मायके आने और पिता जी की सेवा से चूक को पाप से कम नहीं मानती थीं।

निरहू दिन-प्रतिदिन इतराते हुए गांव के गली-कूचों में घूम फिर कर पुश्तैनी पूंजी सम्भाल के रखने का लाभ, बाकी हमजोलियों को हजारों बार सुना चुका था। सब उसकी सूझबूझ पर रश्क करते थे और अफ़सोस भरी सांसें छोड़ते अक्सर उसको सम्मोहित से देखा करते । गंजेड़ियों की अड्डेबाजी में अक्सर सब अपने स्वर्णिम खानदानी अतीत का आल्हा गाते । चिलम ठंडी होते ही जब लोग उठते तो जाते-जाते निरहू के आत्मविश्वास से भरे उत्साह पूर्ण जीवन की जलन साथ लिए जाते।

निरहू अपनी सेवा में रत्तीभर की कमी होने का आभास होते ही जानबूझकर ऐसे समय पर संदूक खोलता जब उसे पता रहता कि बहू या बेटे उसे छुपकर देख रहे हैं। वह हज़ार और पांच सौ के नोटों को गिनता हुआ कई बार देखा जा चुका था । बहू -बेटी, बेटे – दामाद सब यह हिसाब लगाते रात-दिन काट रहे थे कि बाबूजी के पास जो लाखों का ख़ज़ाना है उसे कैसे बांटेंगे। उन्हें पक्का यकीन था कि संदूक में जब नोट इतने हैं कि बाबूजी को गिनने में आधा घंटा लगता है तो सोने-चांदी के जेवरात और जाने क्या-क्या होगा संदूक में । कई बार नीयत यहां तक खराब हुई कि लगभग सबने निरहू के मरने की दुआ की थी लेकिन निरहू था कि दिन बा दिन मुस्टंडा हुए जा रहा था । सत्तर बसंत का रसपान कर चुका निरहू सढियाया भी नहीं लगा कभी लेकिन .....

8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे जब अचानक सरकार ने पुराने नोट बंद करने का एलान किया तो देखते-ही-देखते सारे मंजर बदल गए ।

निरहू के जागरूक बेटे और बहुएं, समय रहते नोट बदलने की सलाह नहींं, हुज्जत लिए निरहू के पास पहुंचे । निरहू अभी-अभी रात का भोजन करके पलंग पर पसरने की फ़िराक में था। वह नीम के सींके से दांतों के मसूड़ों में फंसे संहदा-भात के टुकड़े निकालता पहली ही डकार लिया था कि बेटे और बहुओं ने धावा बोल दिया । नोटबंदी की खबर बताते हुए निरहू को समय रहते नोट बदलवाने की सलाह दी गई जिसे निरहू सुन नहीं सका और बेहोश होकर पलंग पर गिर गया मगर निरहू की किसे फिक्र थी कि वह जिंदा है या मर गया । संदूक का छुपा खजाना देखने के लिए जबरदस्ती उसकी अंटी से चाभी नोच ली गई, दया सिर्फ इतनी हुई कि बेहोश पड़े निरहू के कान में औपचारिक दिलासा मंत्र फूक दिया गया, यही कि संदूक के रूपए, नये नोट से बदलकर, निरहू के जनधन खाते में जमा कर दिये जाएंगे।

ताला खुला तो निरहू के नरक का द्वार भी खुल गया । सबकी आंखों में खून उतर आया यह देखकर कि संदूक में कुछ पुराने फोटो, कपड़े और दस हज़ार रूपये थे। हजार और पांच सौ के यही नोट निरहू देर तक गिनकर सबकी आंखों में धूल झोंके हुए था । सबको भारी निराशा हुई और क्षोभ भी कि इतने दिनों से उनकी कमाई पर बुड्ढा ऐश कर रहा था। निरहू अब अचानक मध्ययुगीन नरक कुंड में डुबो दिया गया था । उसे अब मफादातियों से इतना कठोर दंड मिल रहा था कि उसका दिल-दिमाग सुन्न सा हो गया था ।

संदूक में निरहू के बाबा- दादा के ज़माने की कुछ तस्वीरें थीं जिनमें उस खानदान की स्मृतियों को देखा जा सकता था लेकिन वह तस्वीरे,संदूक के साथ अब खंडहर हुए कबाड़खाने में सड़-गल कर फ़ना हो जाने के लिए फेंक दिए गए थे।

संदूक का ताला खुलने की रात से ही निरहू के ज़लालत भरे जीवन का ताला भी खुल चुका था। गांव के हमजोली अब जब ताना देते हैं तो निरहू यह कहकर रौब गांठने की कोशिश करता है कि सरकार जल्दी ही उसके और सब गरीबों के खातों में पंद्रह – पंद्रह लाख रूपये जमा करने वाली है। निरहू की नटवरी सूझ-बूझ का अब किसी पर कोई असर नहीं है। निरहू का हाल बड़ी तेजी से ख़राब होता जा रहा है । सुना है वह कभी-कभी दूसरे गांव में भीख भी मांगने जाने लगा है । बेटी दामाद भी अब नहीं आते । पुश्तैनी ख़ज़ाने का भ्रम टूटते ही बहुओं ने चूल्हा अलग कर लिया है। बेटे अब जी-जान से गृहस्थ होने में लगे हैं ।

निरहू अब अपने खेत के पंपसेट के लिए बनी झोपड़ी के एक कोने में दुबका अपनी मौत का इंतजार कर रहा है लेकिन मौत भी बुलाने से कहां आती है। रात में जब सियार हुआं हुआं करते हैं तो निरहू हिंया हिंया करता हंसता है ज़ोर ज़ोर से ।

-काली मौर्य

9873657997


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