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राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता - Devki Devra

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता पर चर्चा कोयी नयी बात नही हैं, हज़ारों वर्षों से इन बातों पर न केवल चर्चा होती आयी बल्कि कौन सही है कौन गलत इसे लेकर बड़ी बड़ी लड़ाईयां भी लड़ी गयी है। हमारी सनातन संस्कृति वसुधैव कुटुम्भकम में विश्वास रखती आयी है और इसीलिए जीव मात्र के कल्याण का भाव रखती है। लेकिन जैसे जैसे मानवता का आकर्षण भौतिक सुख साधनों की ओर बढ़ने लगा, निजता का प्रभाव भी बढ़ने लगा।

मैं, मेरा ,हम हमारा आदि विचारों के प्रभाव से विस्तारवाद का फैलाव हुआ, बहुत सारे सही गलत सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर कर भौगोलिक इकाईयों को देश और राष्ट्र की सीमाओं में बांधा गया। आज कल यह चर्चा जोरों पर है कि सही राष्ट्रवाद क्या है, इसमें भी लोगबाग नरम ,गरम, उग्र, अतिउग्रआदि विशेषण लगाने लगे। मेरी समझ मे राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद होता है उसमें क्यों भेद बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं। मैं मानता हूँ कि राष्ट्रवाद को समझाने के लिए राष्ट्र कवि स्व. श्री मैथलीशरण गुप्त की कुछ रचनाएँ ही काफी हैं। उनकी हर एक रचना में राष्ट्रप्रेम कूट कूट कर भरा है। कौन भूल सकता है उनकी कविता के वे अंश जो मुर्दे में भी जान डालने के लिए काफी थे ,"जो भरा नहीं भावों से बहती जिसमें रस धार नहीं, वह हृदय नहीं वो पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं..' " यदि सीधे सरल भाषा मे कहें तो सही राष्ट्रवाद मेरी समझ मे वह है जिसमे,

ऐसा करो जिससे जंहा तुम रह रहे हो वंहा की गुणवत्ता बढ़े और यदि ऐसा नही कर सको तो कमसे कम यह तो सुनिश्चित करो कि तुम्हारी वजह से वंहा कोई नुकसान नही हो। इसी बात को मैं एक कहानी के माध्यम से समझाना चाहूंगा।

आश्रयस्थल का सम्मान:

एक समय की बात है। एक दिन एक केचुवे की एक दीमक से मुलाकात हो गयी। दोनों ही सूक्ष्म जीव हैं और ज्यादातर बिन बुलाए आ जाते हैं। लेकिन दोनों के रुतबे और इज्जत में जमीन आसमान का फर्क है। केचुवे को बड़े आदर से किसान का मित्र बताकर सत्कार कर कर सम्मानित किया जाता हैं, वंही दीमक को दूर से देख कर ही भगाने के प्रयास किये जाते हैं। यंहा तक कि अंदरूनी गद्दारों की तुलना दीमक से कर कर अपमानित किया जाता है।

जिस जमीन पर केचुवे का पदार्पण हो जाता है उसकी कीमत दूनी हो जाती है, वंही जंहा दीमक पहुंच जाती है वह जमीन की कीमत आधी कर देती है। जब भी कभी किसी अंदर के दुश्मन का जिक्र होता है तो यही कहतें है कि यह तो दीमक की तरह हमें खोखला कर रहा है। इसके विपरीत जिस जगह केचुवा आ जाता है , वंहा की मिट्टी सम्हाल कर दूसरी जमीन में पहुंचाई जाती है, जिससे वंहा भी जमीन उपजाऊ हो जाये। दीमक को देखते ही उसे समाप्त करने के अलग अलग उपाय किये जाते हैं। कभी केरोसिन, कभी तारपीन का तेल, कभी कुछ कभी कुछ तरह तरह के रासायनिकों से उसे समाप्त किया जाता है।

जंहा केचुवे की उपस्थिति से प्रसन्नता का वातावरण बनता है वंही दीमक को देखकर उदासी छा जाती है, सबको डर लगने लगता है कि यह दीमक अपना साम्राज्य नही फैलाले।

इन्ही सब बातों को ध्यान में रखते हुए दीमक ने केचुवे से पूछा भाई हम दोनों एक तरह के जीव हैं, दोनों ही सूखी पत्तियां घास फूस गीली मिट्टी आदि से अपना पेट पालते हैं, फिर तुम्हारा इतना सम्मान क्यों और मेरा इतना तिरस्कार क्यों ? इस पर केचुवा पहले तो चुप रहा लेकिन दीमक के बार बार पूछने पर उसे दया आ गयी और उसने बहुत अच्छे से समझाया। केचुवे ने कहा देखो मैं जिंदा रहने के लिए आस पास की ऐसी चीजों को खाता हूं जो वंहा और किसी के काम की नही होती , तथा मैं यह भी निश्चित करता हूं कि मेरे वंहा रहने से किसी को परेशानी नही हो, बल्कि मैं तो यह चेष्टा करता हूं कि वंहा रहने वालों को कुछ सुविधा प्रदान कर सकूं। दीमक ने कहा हम इतने छोटे जीव क्या सुविधा या मदद दे सकतें हैं। केचुवे ने कहा देखो मैं सुखी पतियों को खाकर उनको बढ़िया खाद में बदल देता हूं, मेरी लार से मिट्टी के कणों पर एक परत चढ़ा देता हूँ जिससे उनके अंदर का गीलापन समाप्त नही हो। इतना ही नही मैं उन कणों को अलग अलग दूर दूर कर फैला भी देता हूँ जिससे उनमे से हवा पानी आराम से बह सके।जब किसान बीज बोता है तो मेरे द्वारा पोली की हुई जमीन की वजह से बीज के अंकुरित होने में मदद मिलती है, मेरे द्वारा बनाई हुई खाद पौधों के लिए एक तरह से भोजन का काम करती है। इस तरह मैं किसान द्वारा उगाई गयी फसल को अंकुरित होने से लेकर बड़ी होने तक हवा पानी और भोजन पहुंचाने में मदद करता हूं। इसीलिये जब किसान मुझे अपनी जमीन पर देखता है तो उसे विस्वास हो जाता है कि उसकी जमीन एवं खेती की व्यवस्था पूर्ण रूप से दूरस्थ है।यही कारण है कि वह मेरा आदर सत्कार करता है।

दीमक बोली भाई मेरा क्या दोष है मुझे जरा समझावो। केचुवे ने कहा देखो तुम केवल सूखी काम मे नही आने वाली पत्तियां ही नही खाती हो, जब तुम्हारा इन चीजों से मन भर जाता है तो तुम बीजों के अंदर के पौष्टिक तत्वों को खाने लगती हो, पौधा जब बढ़ने लगता है तो उसके तने, जड़ें , टहनियों सब ओर तुम्हारा ध्यान चला जाता है, उन सभी पर तुम आक्रमण कर देती हो। यंहा तक कि कटे हुए पेड़ों को भी तुम नही छोड़ती हो, पेड़ों के बड़े बड़े लट्ठे भी तुम्हे देख कर घबरा जाते हैं क्योंकि उनको भी तुम अंदर ही अंदर खा कर खोखला कर देती हो।

तुम्हारा यह चंचल स्वभाव तुम्हे चारों तरफ के व्यंजनों की तरफ आकर्षित करता है, जिससे सब तुमसे नफरत करते हैं।

दीमक बोली भाई तुम मुझे बताओ मैं क्या करूँ जिससे मेरी भी थोड़ी बहुत इज्जत हो? केचुवे ने कहा तुम कुछ ऐसा करो जिससे जंहा तुम रह रही हो वंहा की गुणवत्ता बढ़े और यदि ऐसा नही कर सको तो कमसे कम यह तो सुनिश्चित करो कि तुम्हारी वजह से वंहा कोई नुकसान नही हो। यह कैसे होगा इस विषय में मैं तुम्हे नही बता सकता तुम्हे ही कोई उपाय सोचना होगा। दीमक धन्यवाद देती हुई केचवे से विदा लेती है,और उससे वादा करती है कि वो इस विषय मे सोचेगी जरूर।

अभी कुछ दिनों पहले मैंने एक संस्था " द बेटर इंडिया " के माध्यम से कंही पढ़ा कि राजस्थान में सीकर जिले की दांतारामगढ़ तहसील क्षेत्र में एक किसान ने ऐसा अनूठा प्रयोग किया जिसमे उन्होंने बताया कि दीमक होते हुए भी खेती में गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। जरूरत है कि खेत मे निश्चित स्थानों पर मुख्य फसल के बीच बीच मे एक विशेष किस्म का पौधा लगाया जावे। इस प्रयोग से उस क्षेत्र की फसल बहुत अच्छी गुणवत्ता की हुई। इस वृतांत को पढ़ कर मुझे बड़े बुजुर्गों की पुरानी बात याद आ गयी कि संगत अच्छी होनी चाहिए। देखिए विपरीत स्वभाव वाली दीमक पर भी केचुवे का प्रभाव पड़ रहा है। हो सकता है एक दिन ऐसा भी आ जावे जब दीमक का भी आदर सत्कार केचुवे की तरह होने लगे।

कहानी से शिक्षा:

1) हमे हमेशा अच्छे व्यक्तियों का साथ ढूंढना चाहिए।

2) जिस स्थान पर हम रहते हैं, जिस जगह से हमारा पालन पोषण होता है, उस स्थान की कद्र कर कर हमें भी उसकी प्रगति में योगदान करना चाहिए।

3) परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हो धैर्य से तथा आधुनिक वैज्ञानिक सोच से हम समस्याओं को अवसर में बदल सकते हैं। रूढ़िवादी मान्यताओं को यदि वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर परखेंगे तो नई राह निकल पाएगी।


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