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...वो भारत के अमर बलिदानी

अमृत महोत्सव


12 मार्च... वो ऐतिहासिक दिन जब 92 साल पहले महात्मा गांधी ने दांडी मार्च के उद्घोष के साथ स्वदेशी की उस अलख को जगाया जिसने अंग्रेजी शासन की नींव हिलाकर रख दी। बीते वर्ष इसी दिन से भारत ने 75 सप्ताह पहले आजादी के अमृत महोत्सव की शुरुआत की और आज देश का जन-जन अपने स्वाधीनता सेनानियों का स्मरण कर ले रहा है प्रेरणा...


अमृत महोत्सव का एक वर्ष

भा‌रत का स्वाधीनता संग्राम केवल अपनी सत्ता और अपने अधिकारों की लड़ाई भर नहीं था, बल्कि इस लड़ाई में एक तरफ ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ थी, तो दूसरी ओर ‘जियो और जीने दो’ का विचार था। इसमें एक ओर, नस्लीय श्रेष्ठता और भौतिकवाद का उन्माद था, तो दूसरी ओर मानवता और आध्यात्म में आस्था थी। इस लड़ाई में भारत विजयी हुआ, भारत की परंपरा विजयी हुई। भारत के स्वाधीनता संग्राम में समानता, मानवता और आध्यात्म की ऊर्जा भी लगी थी। आजादी की इस लड़ाई में जिन-जिन लोगों ने योगदान किया, देश के लिए जीए और मरे, देश के लिए जवानी खपा दिया, ऐसे हर किसी व्यक्ति को स्मरण करने का, फिर से याद करने का यह अवसर है। साथ ही यह उनके सपनों को याद करते हुए कुछ संकल्प लेने का भी अवसर है। 8 मार्च 1930 को शुरू हुआ सविनय अवज्ञा आंदोलन और 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में ऐतिहासिक दांडी मार्च हमारे स्वतंत्रता संग्राम के मील के वो पत्थर हैं, जिन पर चलकर हमने आजाद भारत का सपना पूरा किया। बीते वर्ष 2021 में नमक सत्याग्रह के 91 वर्ष पूरे होने के पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साबरमती आश्रम से अमृत महोत्सव की शुरुआत पदयात्रा को हरी झंडी दिखाकर की थी।




सुशीला ने क्रांतिकारियों के लिए बेचे अपने गहने

जन्म : 5 मार्च 1905, मृत्यु : 13 जनवरी 1963


दे‌शबंधु चित्तरंजन दास एक बार लाहौर आए थे। कहा जाता है कि उस सार्वनजिक सभा में सुशीला दीदी ने अपना लिखा एक पंजाबी गीत, ‘जुग-जुग गगन लहरावे झंडा भारत दा’ सुनाया था, जिसे सुन कर ‘देशबंधु’ रो पड़े तो भारत-कोकिला सरोजनी नायडू भी भाव विभोर हो उठी थीं। यह गीत उस समय क्रांतिकारियों का पसंदीदा गीत बन गया था। सुशीला दीदी जब कम उम्र की ही थी, तभी उनकी मां का निधन हो गया और वह उसी समय अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कई क्रांतिकारी संगठनों से जुड़ती चली गईं। वह देश को आजाद कराने के लिए कई क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने लगीं, जिसमें गुप्त सूचनाएं पहुंचाने, जनमानस में क्रांति की लौ जगाने के लिए पर्चे बांटने जैसे काम शामिल थे। 5 मार्च 1905 को पंजाब के दत्तोचूहड़ (अब पाकिस्तान में) में जन्मीं सुशीला दीदी एक ऐसी देशभक्त महिला थी, जिन्होंने काकोरी कांड में फंसे क्रांतिकारियों को बचाने के लिए अपनी शादी के लिए रखा 10 तोला सोना तक बेच दिया था। यह सोना सुशीला दीदी की मां ने उनकी शादी के लिए रखा था। सुशीला के सुशीला दीदी बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नही है। असल में सुशीला दीदी के स्कूल की प्राचार्य ने उनकी भेंट दुर्गा भाभी से कराई थी और धीरे-धीरे उन दोनों की बीच संबंध प्रगाढ़ होते गए और उनके बीच ननद-भाभी का रिश्ता बन गया। इसके बाद सुशीला मोहन सभी क्रांतिकारियों के लिए सुशीला दीदी हो गई। कहा जाता हैं कि भगत सिंह भी सुशीला दीदी का बड़ी बहन की तरह सम्मान करते थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार की बहुत सी योजनाओं के खिलाफ मिल कर काम किया था। ब्रिटिश पुलिस अफसर सांडर्स को मारने के बाद भगत सिंह, दुर्गा भाभी के साथ छद्म वेश में कलकत्ता पहुंचे थे और वहां सुशीला दीदी ने उन्हें अपने यहां ठहराया था। वर्ष 1933 में उनकी शादी श्याम मोहन से हुई। पति वकील होने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े हुए थे। वर्ष 1942 के आंदोलन में दोनों पति-पत्नी जेल भी गए। इस दौरान श्याम मोहन को जहां दिल्ली में रखा गया था, वहीं दीदी को लाहौर में। देश को आजाद कराने के लिए वह लगातार यातनाएं सहती रही लेकिन उन्होंने अपना संघर्ष कभी बंद नहीं किया।


कहते हैं सांडर्स की हत्या के बाद कोलकाता में सुशीला दीदी के पास ही ठहरे थे भगत सिंह।



भा

रत में हैदराबाद के विलय के लिए आवाज उठाने वाले क्रांतिकारी रामकृष्ण राव

जन्म : 13 मार्च 1899, मृत्यु : 15 सितंबर 1967


महान स्वतंत्रता सेनानी और हैदराबाद के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बुर्गुला रामकृष्ण राव ने अंग्रेजों ही नहीं, बल्कि हैदराबाद के निजाम के अत्याचार के खिलाफ भी संघर्ष किया। उन्होंने स्वामी रामानंद तीर्थ और कई अन्य नेताओं के नेतृत्व में हैदराबाद के स्वतंत्र भारत में विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हैदराबाद में एक वकील के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले बुर्गुला रामकृष्ण राव का जन्म 13 मार्च 1899 को आज के तेलंगाना राज्य के महबूबनगर जिले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 1923 में पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज और मुंबई विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने 1924 में हैदराबाद में वकालत करनी शुरू कर दी। इसी दौरान वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लेने लगे और लोगों के हित के लिए काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की और भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और यातनाएं सहनी पड़ीं। ‘हैदराबाद सामाजिक सम्मेलन' के सचिव और ‘हैदराबाद सुधार समिति' एवं ‘हैदराबाद राजनैतिक सम्मेलन' के सदस्य रहे बुर्गुला रामकृष्ण राव को 1938 में राज्य कांग्रेस का कार्यकारिणी सदस्य बनाया गया और वह 1937 में प्यूपिल्स कन्वेंशन के सचिव निर्वाचित हुए। वह तीन वर्षो तक आंध्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। भारत की आजादी के बाद उन्होंने समाज सुधार और नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कई समकालीन आंदोलनों में भी भाग लिया। कई भाषाओं के जानकार रहे राव 6 मार्च, 1952 से 31 अक्टूबर, 1956 तक हैदराबाद राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री रहे। बाद में वह 22 नवंबर 1956 से 1 जुलाई 1960 तक केरल और 1 जुलाई 1960 से 15 अप्रैल 1962 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 31 अगस्त 1999 को हैदराबाद के राजभवन में बुर्गुला रामकृष्ण राव की जीवनी का विमोचन किया था। 13 मार्च 2000 को भारत सरकार के डाक विभाग ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था। बुर्गुला रामकृष्ण राव का 15 सितंबर 1967 को निधन हो गया।

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